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टीम अन्ना अपने अनके विसंगतियों से जूझ रही है. कोई भी संस्थान जो सामाजिक मुद्दे पर आन्दोलन को जन्म देती है, वह इन जैसी विसंगतियों से जूझती ही है. यदि कोई संस्था इन विसंगतियों से जूझ कर आगे बढ़ जाती है तब वह और ज्यादा मजबूत होकर ही निकलती है. यदि कोई संस्था सामाजिक बुराईयों के खिलाफ अपने आन्दोलन के धार को लगातार बनाये रखना चाहती है तो निःसंदेह उस आन्दोलन का रूख राजनैतिक रूप धारण कर लेता है. क्योंकि हरेक बुराईयों का कारण राजनैतिक होता है, जो शिखर से ही निकलता है. भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने जैसे काॅमन मुद्दे पर आन्दोलन करने वाली टीम अन्ना भी जब आपने आन्दोलन की आग को निरन्तर जलाये रखना चाहती है तब यह भी कहीं न कहीं से राज्य सत्ता के विरूद्ध ही लड़ेगी. चाहे हिसार का मामला ही क्यों न हो. टीम अन्ना के नेतृत्वकारी टीमों की यह खुशकिस्मती कहा जाय कि आज उनके टीम में वैसे लोगों की भरमार है जो अपनी पूरी जिन्दगी इन बुराईयों से लड़ने में बीता दिया है. जिन्होंने किसी ने किसी रूप में विभिन्न आन्दोलनों से उभर कर सामने आये हैं. इसलिए इन लोगों को डिगा पाना खासकर डरा पाना किसी के भी बूते से बाहर की बात है. हाँ उनपर राजनैतिक हमले, शारीरिक हमले, नैतिक हमले होगें ही, इससे इन लोगों को लड़ना ही होगा. आये दिन टीम अन्ना के ध्वस्त होने की खबरें आने लगी है, यह भी इन हमलों से ही प्रेरित हो सकता है. हो सकता है कि यह टीम टूट और बिखर जाये परन्तु उनमें शामिल लोग पुनः किसी न किसी रूप में सत्ता के सामने चुनौती के रूप में खड़े ही दिखेंगे. क्योंकि आन्दोलन से निकले लोग आग से तप कर निकले वे लोग होते हैं जो हमेशा अपने राख से जी उठने की क्षमता भरपूर होते हैं.

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सकारात्मक विवेचना पर हार्दिक बधाई.

एक मसल है कि समस्या यदि चूहे के बल लगाती हुई आती है तो निराकरण हेतु विरुद्ध-बल भी चूहे का ही होना चाहिये. यदि समस्या हाथी का बल लिये आती है तो निराकरण हेतु लगा बल भी हाथी के बल के बराबर होना चाहिये.  इस मसल की इस अंतर्निहित बात को उक्त टीम जितनी जल्दी समझ जाये उतनी ही संयत रहेगी. अन्यथा उस टीम का बिखरना या भटक जाना आश्चर्यजनक नहीं होगा.

 

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