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ओ बी ओ प्रकाशन सम्बंधित नियम के सम्बन्ध में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

साथियो,
ओपन बुक्स ऑनलाइन (ओ बी ओ) के मंच पर रचनाओं के प्रकाशन से सम्बन्धित नियमावलियों में जिस विशेष नियम को ले कर रचनाकारों में सबसे अधिक असंतोष या भ्रम होता है वह है प्रबन्धन द्वारा "अप्रकाशित और मौलिक रचनाएँ ही स्वीकार्य" के प्रति आग्रह ।  इस विन्दु की व्याख्या "ओ बी ओ नियमावली" में स्पष्ट रूप से की गयी है ।  तथा इस नियम का उल्लेख ओ बी ओ के मुखपृष्ठ पर भी "आवश्यक सूचना" अंतर्गत किया गया है । 


क्या है यह नियम -

२(च)  रचनाकार केवल वही रचना प्रकाशन हेतु पोस्ट करें जोकि पूर्णतया अप्रकाशित हो | ऐसी किसी रचना को इस ई-पत्रिका में स्थान नहीं दिया जायेगा जो किसी वेबसाईट, ब्लॉग अथवा किसी सोशल नेटवर्किंग साईट पर/में प्रकाशित हो चुकी हो | रचनाकार यदि अपनी कोई रचना अपनी या अन्य पूर्व प्रकाशित पुस्तक या किसी प्रिण्ट-पत्रिका से पोस्ट करे तो कृपया उसका ब्यौरा अवश्य दें | ओ बी ओ आयोजनों में प्रस्तुत रचनाएँ भी प्रकाशित मानी जायेंगी और उनका पुनर्प्रकाशन ओ बी ओ पर संभव नहीं है ।

क्यों है यह नियम - 

जैसा कि आप जानते है ओ बी ओ सीखने-सिखाने का मंच है ।  हमारा प्रमुख उद्देश्य नव-सृजन को बढ़ावा देना है । ओ बी ओ प्रबन्धन यह कभी नहीं चाहता कि यह मंच केवल विभिन्न रचनाओं के संकलन का मंच हो कर रह जाय । यदि वेब पर पहले से सामग्री है तो वही सामग्री ओ बी ओ में भी संग्रहित कर हम क्या पायेंगे ? किन्तु रचनाकारों को एक भी नवीन रचना सृजित करने हेतु प्रेरित कर पाये तो यह हमारे लिए ख़ुशी की बात होगी । 

ओ बी ओ पर प्रति माह चल रहे तीन-तीन लाइव कार्यक्रम और एक त्रैमासिक लाइव कार्यक्रम इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हैं । ये चारों इण्टरऐक्टिव आयोजन हमारे उद्देश्य को संतुष्ट करने में सहायक भी सिद्ध हो रहे हैं ।

क्या कहता है यह नियम - 


यह नियम स्पष्ट रूप से कहता है कि, ओ बी ओ पर वही रचना पोस्ट करे जो वेब पर किसी माध्यम से पोस्ट (प्रकाशित) न हो । यानि, आपके निजी ब्लॉग्स, फेसबुक, ऑर्कुट सहित किसी सोशल नेटवर्किंग साइट अथवा वेबसाइट सभी इसकी ज़द में आते हैं । केवल प्रिंट माध्यम में प्रकाशित रचनाएँ, जोकि वेब माध्यम में प्रकाशित न हो, को वेब हेतु अप्रकाशित मानते हुए ओ बी ओ पर प्रकाशित करने की अनुमति प्रदान करते हैं । इसके कई महत्त्वपूर्ण कारण हैं ।

क्या सदस्य गण अपनी रचनाएँ ओ बी ओ पर प्रकाशित हो जाने के पश्चात् कही और या किसी अन्य साइट्स पर प्रकाशित कर सकते है ?

रचनाओं के ओ बी ओ पर प्रकाशित हो जाने के उपरान्त रचनाकार अन्यत्र पोस्ट कर सकते है ।  यहाँ प्रमुखतः ध्यातव्य है कि रचनाकार जब अपनी रचनाओं को ओ बी ओ पर अपलोड करते है तो वह रचना तुरत प्रकाशित नहीं हो जाती, बल्कि ओ बी ओ प्रबंधन द्वारा अनुमोदन के पश्चात ही वह प्रकाशित हो पाती है एवं सभी के लिए सुलभ हो पाती है ।  अतः कोई रचना अनुमोदन पश्चात् ही ओ बी ओ पर प्रकाशित मानी जाती है ।

रचना ओ बी ओ पर अनुमोदन/प्रकाशन के पश्चात आप अन्यत्र पोस्ट कर सकते है किन्तु उस स्थिति में वह रचना मासिक या किसी अन्य "पुरस्कार योजना" से नियमतः बाहर हो जाएगी । ज्ञातव्य है कि ओ बी ओ के पुरस्कार योजना में शामिल होने के लिए किसी रचना को अगले महीने की  5 तारीख तक कही और प्रकाशित नहीं होनी चाहिए ।

साथियो,  प्रत्येक महीने महीने की सर्वश्रेष्ट रचना पुरस्कार हेतु जितनी रचनायें नामित होती हैं उनमे से आधी से अधिक मात्र इसलिए पुरस्कार दौड़ से बाहर हो जाती हैं कि वो रचनाएँ ओ बी ओ पर प्रकाशन के तुरत बाद अन्य वेब साइट्स/ ब्लाग्स/ अन्यान्य सोशल साइट पर प्रकाशित हो जाती हैं । 

पुनश्च 

यह स्पष्ट रूप से सूचित किया जाता है कि प्रकाशन/ अनुमोदन हेतु प्राप्त कोई रचना जो अनुमोदन से पहले अन्यत्र किसी वेब मिडिया (कोई भी वेबसाइट/ ब्लाग्स/ सोशल साइट) पर पायी गयी तो उसे स्वीकार नहीं किया जायेगा । एतैव ओ बी ओ पर कोई रचना यदि अनुमोदित हो भी जाती है और बाद में यह जानकारी होती है कि वह रचना ओ बी ओ पर प्रकाशन होने से पूर्व ही अन्यत्र वेब पर प्रकशित हो चुकी थी तो उस रचना को अविलम्ब हटा दिया जायेगा ।

एडमिन 

2013030701

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Replies to This Discussion

सहमत ................धन्यवाद आदरणीय संपादक महोदय जी 

आभार सम्मानीय संदीपकुमार पटेल जी ।

आ॰ संपादक जी, मैंने नियम अच्छी तरह पढ़, समझ लिए हैं, आगे आपको कोई शिकायत नहीं होगी। बहुत धन्यवाद आपका....

यह मंच एक पवित्र उद्येश्य और व्यापक दर्शन के साथ कृतसंकल्प है  --स्थापित हस्ताक्षरों और नव-हस्ताक्षरों को एक स्तर पर ला कर रचनाधर्मिता की पवित्रता को पगायी जाय. सभी रचनाकार उदार वातावरण में वरिष्ठों के सान्निध्य में ’सीखने-सिखाने’ के माहौल में रचनाकर्म करें.

रचनाकर्म में सिद्धहस्तता या प्राप्य ऊँचाई एकनिष्ठ, सतत और दीर्घकालिक प्रयास से ही संभव है, इस समझ के अंतर्गत ही यह नियम अपनाया गया कि हर रचनाकार इस पटल पर सद्यःरचित और नेट की दुनिया में अप्रकाशित रचना ही प्रस्तुत करे, ताकि हर रचना के साथ उसका अभ्यास प्रगाढ़ होता जाय.  उस रचना पर खूब मीमांसा और विवेचन होले ताकि एक नया रचनाकार रचनाकर्म के मौलिक विन्दुओं को पूरी तरह से आत्मसात कर ले.

ओबीओ के प्रबन्धन को यह खूब भान है कि हर रचनाकार अपने साहित्यिक जीवन में बहुत कुछ ऐसा लिखता है जो अत्यंत प्रभावकारी हुआ करता है. वह ऐसी रचनाओं को अधिक से अधिक पाठकों तक पहुँचाना भी चाहता है. लेकिन ओबीओ का मंच ऐसी पूर्व प्रकाशित रचनाओं के लिए कत्तई नहीं है. कारण कि, रचनाकर्म स्थायी जल-जमाव की तरह न हो कर निरंतर बहते प्रवाह की तरह होता है. नित नूतन..  और यह भी, कि पुरानी रचनाएँ या अन्य स्थानों पर साझा हो चुकी रचनाएँ पाठक/श्रोता की हो चुकी होती है, उन पर सुधार के लिए मीमांसा,  विवेचना या बहस नहीं हो सकती. या, होती भी है तो ऐसी समीक्षाएँ नीर-क्षीर की तरह होती हैं, ’सीखने-सिखाने’ के उद्येश्य से नहीं.

उचित होगा कि हम इस मंच को अपनी अत्यंत समृद्ध और मौलिक रचना दें, ताकि सारा साहित्यिक विश्व प्रयासकर्ता की प्रस्तुति से झंकृत हो उठे.  लेकिन इससे पहले, रचना पर खूब विवेचन और मर्दन तो होले, ताकि किसी अन्य मंच से रचनाकार की उक्त रचना पर अनावश्यक उँगली न उठे.

शुभ-शुभ

मेरे कहे को और विस्तार देने व स्पष्ट करने हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सम्मानीय सौरभ पाण्डेय जी ।

संपूर्ण कार्य-प्रबन्धन यदि संतुलित हो तो यही योग कहलाता है. योग जितना अनुशासन है उतना ही उन्मुक्तता है. जिस घर के सदस्य अनुशासित होते हैं उस घर के सदस्यों की वैचारिक उड़ान असीम होती है.

घर, समाज और संस्थाओं में इसी उन्मुक्तता को व्यापने की आवश्यकता है. अथ योगानुशासनम्  को हम प्रतिदिन दुहराते न रहें और हम इस सूत्र का मात्र सम्मान न करें, बल्कि उसे अपने जीवन में उतार कर समस्त प्रक्रियाओं का अथ अर्थात प्रारंभ करें. इसी आचरण का अग्रह है सार्थक नियमों का अनुपालन.

शुभ-शुभ

  • nhi jtilataon ke karn rchna bhejne me dikkt aati hai

  • kya achchi rchnaon ka aaswadn pun: nhi ho skta hai yh to rchna kar pr ek trh ka ankush hai

  • itnisari shrten lgana ek trh ka prtibndh hi hai

  • aur ydi thok me rchnayen likhi jayengi to rcxhna ka str bhi girega

  • ydi rchna kar ek hi rchna ka adhik pryog krega to swt: hi uphas ka paatr bnega

  • mereis nivedn pr avshy dhyan diya jaye aise meri prarthna hai

सम्मानीय वेद व्यथित जी, मैं आपके प्रश्नों का विन्दुवार प्रतिउत्तर देने का प्रयास कर रहा हूँ ....
  • inhi jtilataon ke karn rchna bhejne me dikkt aati hai

नियमों को जटिलता हम समझे ही क्यों ? नियम तो जटिलता को कम करने हेतु होते हैं, और आज तक किसी ने यह शिकायत नहीं की, यदि सदस्यों को ऐसा लगता है तो कृपया अपनी बातों को तर्कसंगत रूप से रखें । आपको किस कारण नियमों में जटिलता लगी इसका आपने उल्लेख नहीं किया है.

  • kya achchi rchnaon ka aaswadn pun: nhi ho skta hai yh to rchna kar pr ek trh ka ankush hai

रचना यदि अच्छी होगी तो उसका अस्वादन लेने हेतु पाठक उस जगह तक अवश्य पहुँच जायेंगे, यह जरुरी नहीं कि उसे सीखने-सिखाने के मंच पर पुनः प्रकाशित कर अनावश्यक बोझ वहन किया जाय । हर मंच का अपना उद्देश्य होता है । ओ बी ओ का उद्देश्य केवल रचनाओं को थोक में छापते जाना नहीं है, यह बात नियमित सदस्य अच्छी तरह जानते हैं । नियम आवश्यकतानुसार ही हुआ करते हैं । 

  • itnisari shrten lgana ek trh ka prtibndh hi hai

बगैर नियम तो घर भी नहीं चलता आदरणीय ! और नियम का अर्थ प्रतिबन्ध नहीं होता । मौलिक और अप्रकाशित रचना की मांग प्रतिबन्ध लगाना तो कतई नहीं हुआ ।

  • aur ydi thok me rchnayen likhi jayengi to rcxhna ka str bhi girega

यह पक्ति हास्यास्पद है, नियमों के कारण थोक के भाव में रचनायें लिखी जायेंगी ? आप किसी आयोजन की रचनायें देखिये.. आप स्वतः समझ जायेंगे कि यहाँ पर हमारे सदस्य गण किस स्तर की रचनायें लिखते हैं, किन्तु यह सब जानने के लिए आपको समर्पित रूप से समय देना होगा । जिसकी हम सभी को आपसे और आप जैसे सदस्यों से अपेक्षा होगी ।

  • ydi rchna kar ek hi rchna ka adhik pryog krega to swt: hi uphas ka paatr bnega

बात पूरी तरह से अस्पष्ट है, यदि संभव हो तो स्पष्ट करें ।

  • mere is nivedn pr avshy dhyan diya jaye aise meri prarthna hai

ओ बी ओ प्रबंधन प्रत्येक सदस्य की बातों को गंभीरता से लेता है और उसपर गहन चिंतन करता है ।

सादर ।

नियम पढ़े बिलकुल स्पष्ट है, यह मंच सीखने-सिखाने, का मंच है जो इ-पत्रिका में अन्य कोई देहने में नहीं आया | यहाँ रचना का अनुमोदन होना,उसपर टिप्पणियों के माध्यम से विश्लेषण, प्रोत्साहन और पुरस्कार है | ऐसे में यहाँ रचना पोस्ट कर अनुमोदन,स्वीकृत या अस्वीकृत का कोई अर्थ नहीं रहेगा अगर पहले वह कही पोस्ट की जा चुकी है और वहा like टिप्पणिया आने के प्रचात यहाँ पोस्ट होती है | नियम पर पूर्ण टिपण्णी कर आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी ने और स्पष्ट कर दिया है | इस प्रकार नियम स्पष्ट कर अवगत कररने के लिए हार्दिक आभार |

आपका आभार सम्मानीय लक्ष्मन लडिवाला जी ।

. इस पर अभी ध्यान गयाआदरणीय संपादक जी आभार . ओ बी ओ में रचना मौलिक एवं अप्रकाशित हो तो पता था . अगले महीने 5 की तारीख तक भी कहीं प्रकाशित नहीं होनी चाहिए।  .  बहुत धन्यवाद सही जानकारी से अवगत करने के लिए।सदर

सम्माननीया मंजरी पाण्डेय जी, अगले महीने की 5 तारीख तक रचनाओं को अन्यत्र अप्रकाशित रखने हेतु इसलिए कही जाती है क्योंकि "महीने की सर्वश्रेष्ट रचना" की घोषणा अमूमन प्रत्येक माह की 5 तारीख तक ही होती है । ऐसी रचना पिछले एक महीने की पोस्ट समस्त रचनाओं में से चयनित होती है ।

जो सदस्य पुरस्कार योजना से अपनी रचनाओं को बाहर रखना चाहें वो अपनी रचनाओं को ओ बी ओ पर अनुमोदन/प्रकाशन के उपरान्त कहीं भी पोस्ट कर सकते हैं । करते ही हैं !

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आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

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