For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

पं० चंद्रशेखर पाण्डेय ’चंद्रमणि’ जी की नाट्यधर्मिता :: एक तात्विक विवेचन                  डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव

   भारत में नाटक की परंपरा अत्यधिक प्राचीन है I यद्यपि वर्तमान में उपलब्ध भरत मुनि का नाटयशास्त्र ही सबसे पुराना है जो पाश्चात्य विद्वानों की इस धारणा को ध्वस्त करने के लिए पर्याप्त है कि ग्रीस या यूनान में सबसे पहले नाटक का प्रादुर्भाव हुआ। हरिवंशपुराण में लिखा है कि जब प्रद्युम्न, सांब आदि यादव राजकुमार वज्रनाभ के पुर में गए थे तब वहाँ उन्होंने रामजन्म और रंभाभिसार नाटक खेले थे। ऐसे ही अनेक प्रामाणिक आधारों से संतुष्ट होकर विल्सन आदि पाश्चात्य विद्वानों ने स्पष्ट रूप से माना कि भारत में नाटकों का बड़ी प्राचीन और समृद्ध परंपरा रही है I यह अलग बात है कि आरंभिक नाटको की भाषा संस्कृत थी I मध्यकाल में मुसलमान शासकों की धर्मकट्टरता से भारत की साहित्यिक रंग-परम्परा ध्वस्त तो अवश्य हुयी पर लोक-भाषाओं में लोकमंच के अंतर्गत रासलीला, रामलीला तथा नौटंकी आदि के रूप में लोकधर्मी नाट्यमंच जीवित रहा।

 हिन्दी में अव्यावसायिक साहित्यिक रंगमंच आगा हसन 'अमानत लखनवी ' के ‘इंदर सभा’ नामक गीति-रूपक से माना जाता है, जबकि सही मायने में ‘इंदर सभा’ नाट्य कृति थी ही नहीं। इसमें शामियाने के नीचे खुला स्टेज रहता था नौटंकी की तरह तीन ओर दर्शक बैठते थे I एक ओर तख्त पर राजा इंदर का आसन होता था I परियों के लिए कुर्सियाँ रखी जाती थीं। साजिंदों के पीछे एक लाल रंग का पर्दा लटका रहता था I उन्हीं के पीछे से पात्रों का प्रवेश कराया जाता था। राजा इंदर, परियाँ आदि पात्र एक बार उपस्थित होकर और अपने संवाद बोलकर भी फिर मंच से वापस नहीं जाते थे।

      आधनिक काल में साहित्यिक रंगमंच और नाट्य-सृजन की विधि-सम्मत परम्परा भारतेंदु हरिश्चंद्र के अनथक प्रयास से विकसित हुयी जिसे भारतेंदु युग (1850-1900) के नाम से जाना गया I इसके बाद द्विवेदी युग (1900-1921) में नाटकों पर कोई विशेष कार्य नही हुआ I किन्तु परवर्ती प्रसाद युग (1921-1937) ने हिन्दी नाटको में एक क्रांति की अवस्था उत्पन्न कर दी I इस युग के नाटक राष्ट्रीय जागरण एवं सांस्कृतिक चेतना का उद्घोष लेकर आये I उनमें इतिहास तत्व प्रमुख था पर ये नाटक अभिनेय न होने के कारण अधिकांशतः रंगमंच से कटे रहे I इस कारण वे मात्र पाठ्य नाटक बनकर रह गए । इन नाटकों का वैशिष्ट्य यह था कि कथ्य के स्तर पर वे देश की तत्कालीन समस्याओं से जुड़े थे, उनमें आदर्श का स्वर प्रमुख था और वे अपने युग की यथार्थ समस्याओं को अंकित करने में वे अग्रणी रहे ।

इसके बाद हिन्दी नाटकों में प्रसादेतर युग (1937 से अब तक) का प्रादुर्भाव हुआ जो आज तक चल रहा है I इस युग में नाटक ने अपना स्वरुप बदला है I भाव, कथ्य और शिल्प से स्तर पर बहुत से प्रयोग हुए हैं I नाटक का भविष्य क्या होगा, यह कहना कठिन है पर सिनेमा के अभ्युदय से उसकी लोकप्रियता में भारी कमी आयी है I आज का साहित्यकार नाटक-लेखन के प्रति उदासीन दिखता है I किन्तु प्रसादेतर युग के पूर्वार्ध में नाटकों पर बहुत अच्छा काम हुआ है I यही वह समय था जब ग्राम बन्नावां, रायबरेली  निवासी पं० चंद्रशेखर पाण्डेय ’चंद्रमणि ’ (सन्1908 -1982 ई०) ने पौराणिक आख्यानों का आलम्बन लेकर लोक स्तर पर दशाधिक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय नाटकों की रचना की I इतना ही नही जिले की महराज गंज, बछरावा और सदर तहसील के अनेक गावों में स्थानीय युवा उत्साही कलाकारों द्वारा उनका बार-बार मंचन भी कराया I

 रायबरेली जनपद में किम्वदंती (LEGEND) बन चुके पं० चन्द्रशेखर पाण्डेय ‘चंद्रमणि ’ केवल नाटककार ही नही थे I उन्होंने साहित्य की प्रत्येक विधा पर अपनी कलम चलाई है और प्रभूत साहित्य रचा है I साहित्य सेवा मे जो सृजन करता है वह  बहुधा साहित्य का प्रचारक या समाज सुधारक नही होता और धर्मोपदेशक तो कदापि  नही I परन्तु चंद्रमणि जी अपवाद थे I वे साहित्य की लगभग सभी प्रमुख विधाओं के ज्ञाता एवं उसके रचनाकार भी थे I उन्होंने अपने गाँव बन्नावां, रायबरेली में अनेक सस्थायें  स्थापित की, जिनमे भारती भवन, प्रकाशन संस्था , भारती भवन, पुस्तकालय, भारती औषधालय और बन्नावां नाटक समाज प्रमुख हैं I उनकी बहुमुखी प्रतिभा का संज्ञान केवल  इस सत्य से हो जाता है कि वे साहित्यकार, साहित्य प्रचारक, प्रकाशक ,समाज सुधारक, कुशल धर्मोपदेशक, शास्त्रीय राग-रागिनियो के ज्ञाता होने के साथ ही साथ  मान्यता प्राप्त वैद्य और अपने गाव के सरपंच भी थे I उन्होंने इन सभी भूमिकाओं का निष्ठापूर्वक निभाया है जिसके लिए उन्हें रात-दिन काम करना पड़ता था I इतने उत्तरदायित्वों को एक साथ कुशलतापूर्वक निबाहने के कारण ही वे अपने क्षेत्र में एक जीती-जागती संस्था (INSTITUTE) के मानिंद थे I उनके वास्तविक नाम का संज्ञान भले ही लोगों को न हों परन्तु आज भी जंवार में जहाँ कही उनके उपनाम ‘चंद्रमणि‘ जी का जिक्र होता है, लोगों के सिर श्रृद्धाऔर सम्मान से झुक जाते हैं I

      

 चंद्रमणि जी का कुछ साहित्य उनके न रहने पर दूसरे लोगों द्वारा हथिया लिया गया और इस साहित्य-चोरी (PLAGIRISM) का भरपूर दुरूपयोग भी हुआ I इसके बाद भी उनके द्वारा रचे गए उपलब्ध नाटकों की संख्या तेरह है, जिनमें आठ प्रकाशित और पांच अप्रकाशित है I प्रकाशित नाटक हैं- कराल चक्र (प्र० 1933), अजामिल (प्र०1935), राजपूत रमणी (प्र०1937), देवासुर संग्राम (प्र०1961), सती शिरोमणि (प्र०1962), सती सुलोचना (प्र०1965), राजर्षि परीक्षित अथवा कलियुगागमन (प्र०1968) और शतमुख रावण (प्र०1971) I इसी प्रकार अप्रकाशित नाटक हैं- वनवासिनी (र,का.1936-37), सिरसा संग्राम या मलखान समर(र,का. 1947-48 ) ,संसार चक्र (र,का 1952), रामबोला तुलसी (र,का. 1973) और स्यमंतक मणि  I  

चंद्रमणि जी का नाटक रचना काल यद्यपि प्रसाद युग के तुरंत बाद से शुरू होता है, परन्तु उसमें वैसा निगूढ़ साहित्यिक आग्रह नहीं है, जैसा प्रसाद के नाटकों में मिलता है I प्रसाद के नाटक कितने भी साहित्यिक हों पर अभिनय की कसौटी पर वह खरे नही उतरते I चंद्रमणि जी के नाटक इसके बिलकुल विपरीत है I न तो वे अति साहित्यिक आग्रह से आक्रान्त है और न ही उनमे अभिनेयता की कोई कमी है I दरअसल उनके नाटकों पर खासकर शुरुआती नाटकों पर पारसी नाटकों का यत्किंचित प्रभाव है, हालाँकि इस प्रभाव को ग्रहण करने उनके द्वारा आवश्यक सतर्कता भी बरती गयी है I   

पारसी नाटकों का आरम्भ मंगलाचरण के तुरंत बाद या फिर सूत्रधार अथवा  नट और नटी की प्रस्तावना के तुरंत बाद शुरू हो जाते थे I भारतीय नाटकों की यह पुरानी  परंपरा है I कालिदास का ‘शाकुंतल’ भी नांदी स्वर, सूत्रधार और नटी की योजना से आरम्भ होता है I चंद्रमणि  जी के नाटको में यह पारसी प्रभाव नही है I उन्होंने भारत की पुरानी नाट्य परंपरा का ही अनुसरण किया है I यही कारण है कि पाश्चात्य प्रभाव होने के बाद भी उनके नाटक वस्तु, नेता, रस और अभिनय की कसौटी परे खरे उतरते है I

पं० चंद्रमणि ने अपने नाटक के वस्तु चयन में पारसी प्रभाव को स्वीकार नही किया I उनके सभी नाटक या तो मिथ पर आधारित हैं, प्रख्यात है या फिर उनमे भारतीय इतिहास की गौरव गाथाये अनुस्यूत हैं और वे मिश्र प्रख्यात है I ‘करालचक्र‘ में जहाँ महात्मा गांधी का समर्थन है, वही उस काल की राजनीतिक उथल-पुथल का भी चित्राकंन भी हुआ है I यह और ‘संसार चक्र’ का कथानक उत्पाद्य है I इसी प्रकार ‘अजामिल’, ‘देवासुर संग्राम’, ‘सती शिरोमण’, ‘सती सुलोचना’, ‘राजर्षि परीक्षित’ अथवा ‘कलियुगागमन’ ,’शतमुख रावण’, ‘वनवासिनी’ और  ‘स्यमंतक मणि’ मिथकीय आख्यानों पर अवलंबित हैं, जबकि ‘सिरसा संग्राम’ या ‘मलखान समर’, संसार चक्र), रामबोला तुलसी’ ऐतिहासिक नाटक हैं I उनके नाटकद्वय  ‘संसार चक्र ‘ और ‘कराल चक्र’ सामाजिक नाटक है I नाटकों के वस्तु-चयन में चंद्रमणि  जी प्रसिद्ध कवि एवं नाटककार जयशंकर प्रसाद के अधिक नजदीक है I दोनों ही राष्ट्रवादी और भारत की प्राचीन संस्कृति और परम्पराओं के पोषक हैं I

पारसी शैली के नाटकों में मांसल और उत्तेजक नृत्य और वादन-गायन अर्थत सगीत के तीनों रूपों का का प्राचुर्य होता था I उनमे ग्लैमर अर्थत ठाट-बाट. चमक–धमक और चामत्कारिक प्रस्तुति के प्रति विशेष आग्रह रहता था I दर्शकों के मनोरंजन के लिए इन नाटको में फूहड़ हास्य के प्रसंग भी जोड़े जाते थे जबकि नाटक की आधिकारिक कथा से उसका कुछ भी लेना देना नही होता था I इन नाटकों में भारत की सभ्यता और संस्कृति के प्रति और नाट्य -कला के प्रति भी कोई प्रतिबद्धता नही दिखती थी I भारत की अशिक्षित जनता की सुप्त कामेच्छा को प्रदीप्त कर उन्हें बेवकूफ बनाना, उनको सस्ता एवं सतही मनोरंजन प्रदान करना तथा उनके धन का व्यपहरण करना ही इन पारसी नाटकों का असली मकसद था I देशाभिमान और राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत करने जैसे अहम मुद्दों से इनका दूर तक संबंध नही था I भारतेंदु और प्रसाद के नाटक जहां अव्यावसायिक थे, वही पारसी नाटक विशुद्ध रूप से व्यावसायिक थे और उनका एक मात्र उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण अधिक से अधिक धन कमाना था I  

 चंद्रमणि जी धर्म-परायण होने के साथ ही साथ मर्यादावादी कवि, हरफनमौला साहित्यकार एवं धर्मोपदेशक थे I उन्होंने पारसी थियेटर का प्रभाव तो ग्रहण किया परन्तु उसकी तमाम बुराइयों को बरतरफ़ करते हुए I पारसी परम्परा के नाटकों में अंको और दृश्यों की भरमार रहती थी I नाटक का मंचन भी देर रात तक या रात भर चला करता था I सामान्यत: नाटक में तीन अंक होते थे, जिनमे दूसरा अंक सबसे अधक दृश्यों वाला और तीसरा अंक सबसे कम दृश्यों वाला होता था I चंद्रमणि जी ने इस परम्परा को अपनाया और अपने नाटकों में गीतों की झड़ी लगा दी I यहाँ तक कि संवाद भी अधिकांशतः पद्य में ही रचे गए , पर वे कभी भी फूहड़ या भदेश नही हुए I उन्हें शास्त्रीय राग-रागिनियों का अच्छा ज्ञान था और उसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने गीत लिखे I अधिक गीतों से उनके नाटको का वस्तु-प्रवाह भले ही बाधित हुआ हो पर पारसी थियेटर के इस प्रभाव को उन्होंने स्वीकार अवश्य किया I हालांकि अपने परवर्ती नाटकों में उन्होंने अपनी इस प्रवृत्ति पर अंकुश भी लगाया I 

चंद्रमणि जी की पात्र योजना वैविध्यपूर्ण है I उनके नायक सदैव धीरोदात्त ही नही है I अधिकांश चरित्र मिथकीय है I भारतीय परंपरा में नायक धीरोदात्त, धीरललित अथवा धीरोद्धत कुछ भी हो सकता था I कुलीनता और सुन्दरता भी प्रायशः अनिवार्य थी i किन्तु बाद में किसान, मजदूर, निम्नजाति के लोगों को केंद्र में रखकर भी नाटक लिखे गए I नारी प्रधान नाटकों में उनके चरित्र के उत्कर्ष का आख्यान इन नाटकों में हुआ है I चंद्रमणि जी के केन्द्रीय पात्र अधिकाशतः पौराणिक एव ऐतिहासिक है I ऐतिहासिक पात्रों में अजामिल, दैत्यराज बलि, भगवान विष्णु, सती अनुसूया, सती सुलोचना, राजर्षि परीक्षित अथवा शतमुख रावण, शबरी, कृष्ण, जाम्बवन्त और सत्राजित आदि प्रमुख है I ऐतिहासिक चरित्रों मे उदयपुर राज्य के प्रधान सेनापति चन्द्रवत, औरंगजेब, पृथ्वीराज, मलखान सिह , तुलसी और रत्ना उल्लेखनीय हैं I ‘संसार चक्र’ और ‘कराल चक्र’ नाटक के केन्द्रीय पात्र समाज के प्रतिनिधि हैं I चंद्रमणि जी के नाटकों में उत्तम, माध्यम और निकृष्ट तीनों तरह के पात्र है I पारसी थिएटर के अनुकरण में विदूषक जैसे हास्य पात्रो की योजना भी नाटको में अवश्य हुयी है पर वैसा फूहडपन इन पात्रों में नही है I  इन पात्रों के नाम भी ऐसे रखे गए है जिससे हास्य की संभावना स्वतः प्रकट हो जाती है I जैसे- लपेटे- झपेटे, ढपोरशंख, चौपटानंद, बंटाधार, लोभान्न्द, झब्बर बाबा, भुसई चौबे आदि I नाटक में पात्रो का चरित्र घटनाक्रम के - विकास के साथ स्वतः उद्घाटित होता चलता है I

आचार्यों ने माना है कि नाटक एक दृश्य-श्रव्य काव्य है I इसके दर्शन तथा श्रवण से जो अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है, वही काव्य में रस कहलाता है । आचार्य विश्वनाथ ने कहा भी है – रसात्मक वाक्यम् काव्यम्  I नाटको को लोग देखते भी है और सुनते है  इसलिये रस को अधिकाधिक संप्रेषित करने की क्षमता नाटको में सबसे अधिक होती है I इस दृष्टि से पं० चंद्रमणि के नाटकों में कोई भी रस अछूता नही रहा है I यद्यपि उनका भरपूर दखल ज्ञान के अनेक क्षेत्रों एवं विधाओं में रहा है, पर मूलतः वे भक्त, धर्म प्रवक्ता  और साहित्यकार थे,  इसके बाद ही कुछ और I साहित्य के सम्बन्ध में वे तुलसी के अनन्यसमर्थक थे और उनका आदर्श था –‘कीरति भनिति भूति भलि सोई I सुरसरि सम सब कर हित होई II’  

पं० चंद्रमणि  के नाटक ‘अजामिल’ में भक्ति, शृंगार, वीर, करूण, शांत तथा हास्य रस की प्रधानता है I ‘राजपूत रमणी’ में शृंगार, करूण, हास्य, भयानक एवं वीभत्स रस की सुंदर योजना हुयी है I ‘वनवासिनी’ में भक्ति रस का रंग गहरा है पर सहायक रस के रूप में भयानक, वीभत्स, करुण और हास्य रस का भी परिपाक हुआ है I ‘देवासुर संग्राम’ में भयानक और अद्भुत रस की गंगा बही है I ‘संसार चक्र, शृंगार और भयानक और हास्य रस से परिपूर्ण है I ‘राजर्षि परीक्षित’ में वीर, अद्भुत और हास्य की बड़ी ही सुष्ठु योजना हुयी है I इस प्रकार चंद्रमणि जी के नाटकों  में सभी रसों की मोहक सृष्टि हुयी है I

चंद्रमणि जी के नाटकों की भाषा सरल, सुबोध, स्वाभविक, प्रवाहमय और पात्रानुकूल है I इसके साथ ही भाषा के बोधगम्यता भी इन नाटकों की संप्रेषणीयता में सहायक हुयी है I कथोपकथन अधिकांशतः छोटे, चुस्त और चुटीले हैं I संवाद भी अधिक बड़े नहीं है I पारसी प्रभाव से अधिकाश नाटकों के सवादों में तुकांतता, गेयता और स्वर-मैत्री का विशेष ध्यान रखा गया है I स्वगत-कथन के अवसर भी नाटकों में विद्यमान हैं I देशकाल और वातावरण को प्रांजल बनाए रखने में कतिपय नाटकों में ईषत चूक अवश्य हुयी है I प्रत्येक दृश्य के साथ मंच-सज्जा साधारण रखी गयी है ताकि नाटकों के मंचन और अभिनय में सहजता रहे I उन्होंने नाटकों के रूप, आकार, दृश्यों की सजावट और उसके उचित संतुलन के साथ ही परिधान और मंचीय व्यवस्ता का पूरा ध्यान रखा है I संस्कृत नाट्य परम्परा में रंगमंच और अभिनय की सीमा और सामर्थ्य का विशेष ध्यान रखते हुए मंच पर कुछ दृश्य की प्रस्तुति को वर्जित माना गया है जैसे नदी और के पहाड़ दृश्य, हत्या-आत्म हत्या या फांसी के दृश्य, युद्ध और विप्लव के दृश्य, पात्रों के नहाने, खाने अथवा वस्त्र बदलने के दृश्य I शेक्सपियर के नाटकों में ऐसे वर्जित दृश्यों का बाहुल्य है I पारसी थिएटर पर इन अंग्रेजी ड्रामों का व्यापक प्रभाव था I अपने कुछ नाटकों में चंद्रमणि जी ने पाश्चात्य नाटकों और पारसी थिएटरों की इस परम्परा का प्रभाव ग्रहण किया है I उदाहरण के लिए ‘कराल चक्र’ नाटक में पात्रों का मदिरा-पान, विजय सिह की हत्या और ज्ञान सिंह को फांसी ऐसे ही वर्जित दृश्य हैं I

 

 (मौलिक/अप्रकाशित )

Views: 512

Reply to This

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

दोहा पंचक. . . .संयोग शृंगारअभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही…See More
12 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Friday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Thursday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service