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हाहाहा !!!अंतिम समय तक कुर्सी पर बने रहें , बस यही चाहते हैं. कुर्सी पर बैठे बैठे अंतिम सांस लें , बस कटू सत्य उजगार करती रचना .बधाई आपको
बहुत ही सुंदर आकांक्षा आदरणीय विजय शंकर जी .बधाई आप को .
इन नेताओं की बात मत पूछो जी।
खूब पिटते हैं लेखकों से , मगर शर्म है कि आती नहीं।
आपने भी धो डाला , आदरणीय।
आकांक्षा का यह विकृत स्वरूप बहुत अच्छी तरह उभर कर सामने आया है इस लघुकथा से I प्रदत्त विषय के साथ तो पूरी तरह न्याय हुआ ही है, लेकिन जिस प्रकार नेता जी के चेहरे से आकांक्षा नकाब को खींच कर अलग किया गया है, वह भी कमाल कर गया I इस बेहद कसी एवं सधी हुई लघुकथा हेतु मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें आ० डॉ विजय शंकर जी I
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