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मैथिली साहित्य Discussions (38)

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गजल

अहाँ मुस्कैत रही  हमरा देखैत रही अहाँकेँ प्रेम गजल नव-नव सुनबैत रही   रुसल सजनी जँ रही प्रेमसँ बौसैत रही सगर गुणगान अहाँक हम गाबैत रही   मध…

Started by जगदानन्द झा 'मनु'

0 Aug 10

गजल

हाथमे हाथ लेने सगरो चलब हम आब तोहर बिना पल भरि नहि जियब हम हो सुखद की कतेको अन्हार जीबन बनि क छाहैर तोहर संगहि रहब हम दीप नेहक मिझेए नहि…

Started by जगदानन्द झा 'मनु'

0 Aug 9

भक्ति गजल

सजल कन्हाइ रूपक रस बहाबैए हरिक ई रूप दुनियाकेँ रिझाबैए मुकुटपर पैंख मोरक मोहनी सोहै हियामे रस सिनेहक ई जगाबैए जखन बाजै मधुर मुरली मुरारीक…

Started by जगदानन्द झा 'मनु'

0 Jun 11

प्रसाद बुझी हम पीबी रहल छी (बाबा के गीत )

प्रसाद बुझी हम पीबी रहल छी ई जीवन दुःख बाबा यौ नाम अहाँ के रटते -रटते ,करबै जीवन अंत यौ....... प्रसाद बुझी हम पीबी रहल छी ई जीवन दुःख बाब…

Started by kanta roy

1 Sep 20, 2016
Reply by जगदानन्द झा 'मनु'

जकरे देह में आगि लगैत छैक सैह ने जड़ैत अछि (लघुकथा)

एक दिन दू आदमी के झगड़ा होइत रहैक , जकर गलती रहइ से ओहि ठाम उपस्थित लोक के बेर - बेर दोसर के इंगित कs कहय जे एकर बात पर हमरा देह में आगि लाग…

Started by SANJAY KUMAR JHA

0 Aug 23, 2015

अथ फिनायल कथा !

दुःख हरो द्वारका नाथ शरण मैं तेरी ……. ! मोबाइलक घण्टी बाजल ! स्क्रीन पर चमकै छल “ कनियाँ के फोन ” ! इग्नोरक त प्रश्ने नहि !! धरफरा क फोन उ…

Started by SANJAY KUMAR JHA

1 Aug 23, 2015
Reply by SANJAY KUMAR JHA

बेटी आ बहिनक मनोरथ के बारे में सेहो सोचु (लघुकथा)

अपना विवाह में बहुत राश संगी साथी के बरियाती जयबाक लेल कहलियनि , एबो केलाह , मुदा एकटा मित्र कहलाह जे जायब त लेकिन दारू पिबे टा करब । हम कह…

Started by SANJAY KUMAR JHA

3 Aug 11, 2015
Reply by kanta roy

चरिपतिया

               (१)चाहे आहाँ रहु दिल्ली आ मुम्बई,वा रहु देश-विदेशक कोनो कोण में,मैथिल भेटिते मैथिली बाजू टन द' मिठगर बोल में ।              …

Started by SANJAY KUMAR JHA

0 Aug 11, 2015

सीता माता वन्दना

तर्ज़ : जय जय भैरवि अशुर भयाऊनि जय जय सीता मिथिला तारिणी जनक धिया सुखदाईसुन्दर सुमति दिय हे मातादुःख निवारू माईजय जय सीता मिथिला तारिणी ।…

Started by SANJAY KUMAR JHA

0 Aug 10, 2015

गीत

ई जे साँझ परलै मैया की हमरे जीवनमे मुनल आँखि तकबै कहिया हमरो जीवनमे।। सगर दुनियाँकेँ चिलका माएक आँचर तर हम अभागल कोना भटकै छी दर-दर।। घुर…

Started by जगदानन्द झा 'मनु'

9 Aug 10, 2015
Reply by kanta roy

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"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
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"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
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जगदानन्द झा 'मनु' added 2 discussions to the group मैथिली साहित्य
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Shyam Narain Verma commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"नमस्ते जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
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"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Aug 3

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"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
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"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
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सांकल मन के द्वार पर

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आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
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कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
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