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आदरणीय काव्य-रसिको !

सादर अभिवादन !!

  

’चित्र से काव्य तक छन्दोत्सव का यह एक सौ सतहत्तरवाँ योजन है।

   

 

छंद का नाम  -  चौपाई छंद  

आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ - 

25 मार्च’ 26 दिन बुधवार से

31 मार्च 26 दिन मंगलवार तक

केवल मौलिक एवं अप्रकाशित रचनाएँ ही स्वीकार की जाएँगीं.  

चौपाई छंद के मूलभूत नियमों के लिए यहाँ क्लिक करें

जैसा कि विदित है, कई-एक छंद के विधानों की मूलभूत जानकारियाँ इसी पटल के  भारतीय छन्द विधान समूह में मिल सकती हैं.

***************************

आयोजन सम्बन्धी नोट 


फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ : 25 मार्च’ 26 दिन बुधवार से 31 मार्च 26 दिन मंगलवार तक रचनाएँ तथा टिप्पणियाँ प्रस्तुत की जा सकती हैं

अति आवश्यक सूचना :

  1. रचना केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, अन्य सदस्य की रचना किसी और सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी.
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  3. सदस्यगण संशोधन हेतु अनुरोध  करें.
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  6. इस तथ्य पर ध्यान रहे कि स्माइली आदि का असंयमित अथवा अव्यावहारिक प्रयोग तथा बिना अर्थ के पोस्ट आयोजन के स्तर को हल्का करते हैं.
  7. रचनाओं पर टिप्पणियाँ यथासंभव देवनागरी फाण्ट में ही करें. 
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  9. रचनाओं को लेफ़्ट अलाइंड रखते हुए नॉन-बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें. अन्यथा आगे संकलन के क्रम में संग्रहकर्ता को बहुत ही दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

छंदोत्सव के सम्बन्ध मे किसी तरह की जानकारी हेतु नीचे दिये लिंक पर पूछताछ की जा सकती है ...


"ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" के सम्बन्ध मे पूछताछ

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सौरभ पाण्डेय
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Replies to This Discussion

आदरणीया प्रतिभाजी ,

हार्दिक धन्यवाद आभार आपका।  संशोधित चौपाई पोस्ट कर दिया हूँ।

आदाब। परिदृश्य को छंद अनुसार शाब्दिक कर नववर्ष की सुगंध फैलाने हेतु हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी।

आदरणीय शेख शहजादजी 

हार्दिक धन्यवाद आभार आपका।  छंदोत्सव में आपकी उपस्थिति के लिए पुनः धन्यवाद ।

बौर से फल तक

***************

फागुन आया ऐसा छाया, बाग़ आम का है बौराया

भरी मंजरी ने तरुणाई, महक रही सारी अमराई

 

मंजर की ऐसी बहुतायत, नहीं राम से रही शिक़ायत

मौसम भी अनुकूल रहा है, बौर शाख पर झूल रहा है

 

रहा सदा जीवन का हिस्सा, हर हिस्से का है इक किस्सा

बौर नहीं आशा है अमवा, डरता-हँसता पागल मनवा

 

मधुआ-भोंगा से बच जाएँ, कीट-फफूंद नहीं खा जाएँ  

आँधी बारिश ज्यादा ना हो, असमय लू से भी रक्षा हो

अब किसान हो कर उत्साहित, करने लगे इन्हें उपचारित

फिर कुछ हफ्तों बाद पकेंगें, मधुर-रसीले आम मिलेंगें

 

हापुस लंगड़ा केसर चौसा, सिंदूरी नीलम व सफेदा

तोतपुरी मलीहाबादी, और दशहरी रस की वादी

 

खट्टा-मीठा रस बरसाता, आम फलों पर राज चलाता

पर सबका आरंभ यहीं है, बौर नहीं तो आम नहीं है

 

#मौलिक एवं अप्रकाशित

  आदरणीय अजय गुप्ता अजेय जी सादर, प्रथम दो चौपाइयों में आपने प्रदत्त चित्र का सुन्दर वर्णन किया है. करने लगे इन्हें उपचारित... हाँ अब किसान जागरूक है और वह उत्पादन और गुणवत्ता बढ़ाने पर बहुत ध्यान देने लगा है.  चौसा/सफेदा यह तुकांतता छंदों में बहुत अच्छी नहीं मानी जाती है. तोतपुरी ... टंकण त्रुटि रह गई है. सादर 

आदरणीय अशोक जी, रचना/छंदों पर अपनी राय रखने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। 

//तोतपुरी ... टंकण त्रुटि रह गई है.// जी उचित कह रहे हैं आप। 

//चौसा/सफेदा यह तुकांतता छंदों में बहुत अच्छी नहीं मानी जाती है// जी सहमत हूँ। मैं पहले से ही इस प्रयास में हूँ कि इसे ठीक कर सकूँ। आप के किसी सुझाव का इंतज़ार है। मालदा जोड़ने में मात्राएं नहीं बैठ रहीं। तो कौशिश जारी है। 

पुनः बहुत आभार और धन्यवाद आपका 

  जी ! //हापुस लँगड़ा नीलम केसर। आम सफेदा चौसा उस पर।।//... कुछ इस तरह किया जा सकता है. सादर 

गोष्ठी में हमें मार्गदर्शन प्रदान करने हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीय अशोक कुमार रक्ताले जी।

आदरणीय अजय भाईजी 

फागुन आया ऐसा छाया, बाग़ आम का है बौराया

भरी मंजरी ने तरुणाई, महक रही सारी अमराई ..... मनमोहक  पंक्तियाँ।

चित्रानुरूप सुंदर चौपाई की हार्दिक बधाई। 

मात्रा की तुकांतता ...  ना हो ---- रक्षा हो ।  छंद आदि में मान्य नहीं है।

विषय मुक्त होने के कारण लघु कथा लिखने का प्रयास किया है , अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे। 

नव वर्ष 2083 की शुभकामनाएँ 

छंदों पर अपनी प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार आदरणीय भाई अखिलेश जी। 

मात्रा की तुकांतता ... ना हो ---- रक्षा हो । छंद आदि में मान्य नहीं है।// जी ऐसा नहीं है कि के तुकांतता मान्य नहीं है। हाँ यह अवश्य है कि इस प्रकार के प्रयोग को निकृष्ट तुकांतता में रखा जाता है। कईं बार ऐसी स्थिति आती है कि इस प्रकार की तुकांतता को निभाना पड़ता है। जैसे प्रस्तुत पंक्ति में नामों का विवरण है तो यहाँ परिवर्तन की जगह बहुत कम बचती है। लेकिन मैं प्रयासरत हूँ इसे ठीक कर सकूँ। गहराई से पढ़कर ध्यान दिलाने के लिए अनेक आभार। यह स्नेह बनाए रखिएगा। 

सादर 

लघुकथा पर जा रहा हूँ।  

आदरणीय अजय जी

बौर से फल तक के सफर को आपने बहुत संयत और सुन्दर शब्द दिए हैं। साथ में किसानों और फल को हम तक लाने के लिए  उनकी मेहनत को भी आप नहीं भूले हैं..वाह। हार्दिक बधाई  इस सार्थक छंद सृजन के लिए 

अनेक आभार प्रतिभा जी ।

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