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Vijay Joshi
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Sheikh Shahzad Usmani commented on Vijay Joshi's blog post लघुकथा :साथी
"आपकी बेहतरीन लघुकथाओं की श्रेणी में एक और रचना। बेहतरीन अंतिम पंक्ति के साथ बेहतरीन शैली के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय विजय जोशी 'शीतांशु' जी। लेकिन मेरे विचार से 'प+रि+भा-षा' में लपेटने की आवश्यकता नहीं थी।  'साथी'…"
Feb 4
Samar kabeer commented on Vijay Joshi's blog post लघुकथा :साथी
"जनाब विजय जोशी जी आदाब,बहुत अच्छी लगी आपकी लघुकथा,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Feb 4
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Vijay Joshi's blog post माँ की चिंता
"आद0 विजय जोशी जी सादर अभिवादन। बढिया लघुकथा। इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें।"
Feb 3
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Vijay Joshi's blog post माँ की चिंता
"बहुत ही भावपूर्ण कथा कही आदरणीय..सादर"
Feb 2
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Vijay Joshi's blog post लघुकथा वसन्तोत्सव
"बड़ी ही सुन्दर श्रृंगारिक लघु कथा कही है आदरणीय..सादर"
Feb 2
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Vijay Joshi's blog post माँ की चिंता
"अच्छी लघुकथा हुई है आ. विजय जी । हार्दिक बधाई ।"
Feb 2
Vijay Joshi posted a blog post

लघुकथा :साथी

गौरी, पिता के स्नेहिल परिधि में एक साथी की परिभाषा का 'प' समझ पाई। उसी पिता के आँगन में एक लंबा सा साथ निभाने के लिए उसके बचपन को बांटने के लिए भाई के रिस्ते ने साथ दिया। तब वह साथी की परिभाषा के दूसरे पायदान पर 'रि' रूपी रिस्ते को समझने की कोशिश भर कर रही थी। पिता का वह आँगन गौरी की परवरिश के साथ-साथ, बेटी के पराये होने का एहसास भी कराता रहता था। उसकी शिक्षा-दीक्षा की इतिश्री मानकर पिता ने जीवन के लिए, फिर से एक साथी की तलाश शुरू कर दी। जो बेटी भाग्य विधाता होगा। पिता से भी ज्यादा अच्छे से साथ…See More
Feb 2
Samar kabeer commented on Vijay Joshi's blog post लघुकथा वसन्तोत्सव
"जनाब विजय जोशी जी आदाब,इस सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।"
Feb 1
Samar kabeer commented on Vijay Joshi's blog post माँ की चिंता
"जनाब विजय जोशी जी आदाब,इस सुंदर प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Feb 1
Mohammed Arif commented on Vijay Joshi's blog post माँ की चिंता
"आदरणीय विजय जोशी जी आदाब,                              जवान बेटी को लेकर माँ की बेचैनी-व्याकुलता को रेखांकित करती सशक्त लघुकथा । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।"
Feb 1
Vijay Joshi posted blog posts
Jan 31
Sheikh Shahzad Usmani commented on Vijay Joshi's blog post लघुकथा वसन्तोत्सव
"बहुत बढ़िया पेशकश। हार्दिक बधाई आदरणीय विजय जोशी 'शीतांशु' जी।"
Jan 31
Vijay Joshi commented on TEJ VEER SINGH's blog post घुटन – लघुकथा  -
"एक अच्छी रचना के लिए बहुत बधाई सर जी। "
Jan 30
Vijay Joshi replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-30
"आदरणीया रवि भाई जी आभार , आपने मेरे लिए वक्त दिया। आपने विचारों से अवगत करवाया। आपके सुझाव पर और नया लिखने का प्रयास करने की कोशिश करुगा।"
Sep 29, 2017
Vijay Joshi replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-30
"आदरणीय जनाब समर कबीर जी आभार , आपने मेरे लिए वक्त दिया। आपने विचारों से अवगत करवाया। आपके सुझाव पर और नया लिखने का प्रयास करने की कोशिश करुगा।"
Sep 29, 2017
Vijay Joshi replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-30
"आदरणीया प्रतिभा जी आभार , आपने मेरे लिए वक्त दिया। आपने विचारों से अवगत करवाया। आपके सुझाव के लिये धन्यवाद। नया लिखने का प्रयास करने की कोशिश करुगा।हॄदय की अनन्त गहराइयों से आभार"
Sep 29, 2017

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Profile Information

Gender
Male
City State
Maheshwar
Native Place
Maheshwar
Profession
Teacher's
"बटवारा"बटवारे का जब अभियान चला।दोनों बेटों में घमाशान चला।बस मैं छटता ही चला गया ।हर बटवारे में।तन्हाइयां मेरे ही हिस्से में ।मुझे छोड़ सब बट गया जब,कतरा–कहरा बराबर दो हिस्सों मेंजो तिनका तिनका कर जोड़ा था जीवन में।अब मैं बिल्कुल तन्हां था।साथ कोई न मेरा संचय अपना था।न मेरे अपने साथ रहना चाहते थे।न मैं किसी के हिस्सें आया था।एक जीवन संगिनी जो,सात जन्मों का वादा करमँझधार में ही छोड़ गई।जीवन की तन्हाई से मेरे नाता जोड़ गई।अब भी तन्हाई में रहता हूँ।पिता होने का दर्द सहता हूँ।– विजय जोशी 'शीतांशु'महेश्वर,जिला खरगोनरचना मौलिक एवम् अप्रकाशित है।

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At 8:15am on October 8, 2015, kanta roy said…
मेरा हौसला बढाने के लिए हृदयतल से आभार आदरणीय विजय जी । दिल को जिस काम को करने में खुशी मिले उस काम में वक्त का सच में मालूम ही नहीं पडता है कि कब दिन हुई और कब रात हुई । सादर अभिनंदन आपको ।

Vijay Joshi's Blog

लघुकथा :साथी

गौरी, पिता के स्नेहिल परिधि में एक साथी की परिभाषा का 'प' समझ पाई। उसी पिता के आँगन में एक लंबा सा साथ निभाने के लिए उसके बचपन को बांटने के लिए भाई के रिस्ते ने साथ दिया। तब वह साथी की परिभाषा के दूसरे पायदान पर 'रि' रूपी रिस्ते को समझने की कोशिश भर कर रही थी। पिता का वह आँगन गौरी की परवरिश के साथ-साथ, बेटी के पराये होने का एहसास भी कराता रहता था। उसकी शिक्षा-दीक्षा की इतिश्री मानकर पिता ने जीवन के लिए, फिर से एक साथी की तलाश शुरू कर दी। जो बेटी भाग्य विधाता होगा। पिता से भी ज्यादा अच्छे से…

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Posted on February 2, 2018 at 12:30am — 2 Comments

माँ की चिंता

/माँ की चिंता//

''माँ तुम आज फिर,अब तक जाग रही हो? कितनी बार समझा चुकी हूँ कि ठंडी रातों में इतनी देर तक जागना तुम्हारी सेहत के लिए ठीक नहीं है।"

फिर से अस्थमा का दौरा पड़ सकता है। तुम समझने का नाम ही नहीं लेती हो!

आई बड़ी समझाने वाली। 'बेटी, मेरी चिंता छोड़, जीना ही कितने दिन है।' और "जिसकी बेटी देर रात तक काम से लौटे उस माँ को नींद कहाँ से आएगी।"

माँ दरवाजे पर ही टकटकी लगाये बैठी थी।

'बेटी तेरा काम क्या है?' कहाँ काम पर जाती है?' किसके घर काम पर जाती...

बेटी ने बीच…

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Posted on January 30, 2018 at 9:37pm — 5 Comments

लघुकथा वसन्तोत्सव

कड़कड़ाती ठंड में वसुधा की कँपकपि असहाय हो रही थी। सूरज को इसकी खबर हुई तो वह बहुत दूर अपनी वार्षिक यात्रा पर था। शीघ्र लौट कर सब ठीक करने का आश्वासन दिया। तो उसके लौटने की खबर से ही, ठंड ने अपना दायरा समेटना शुरू कर लिया।

वसुधा अपने नैसर्गिक रूप में पुनः खिलखिलाने लगी। वसुधा नव यौवना सी मुस्कान लिए साजन से मिलन के सतरंगी सपने सजाने लगी। हाथों में मेहँदी रंग रचने लगा।

पतझर से प्रकृति ने धरा पर रांगोली सजाई। तो वन उपवन में अमलताश ,पलाश, शिरीष , ने वसुधा के लिए वंदनवार सजाएं।…

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Posted on January 30, 2018 at 9:00pm — 3 Comments

बचपन (लघुकथा)~शीतांशु

1 ||बचपन||



मैं मध्य अवकाश के बाद हमेशा स्कूल से छूमंतर हो जाता । दीदी, अक्सर बैग उठाकर लाती । और घर पर मुँह बंद रखने के बदले मुझसे चॉकलेट जरूर लेती थी। किन्तु मैं बेफिक्र होकर कभी फूलों के लिए 'चम्पा की बॉडी', बेर के लिए नरसिंग टेकड़ी, तो कभी पिकनिक मनाने 'भेडलेश्वर-बड़दख्खन' के बाग में , नदी किनारे चले जाते था। और ठीक स्कूल छूट्टी के समय पर घर लौट आने का क्रम चलता रहा। मैडम की शिकायत भी दीदी संभाल लेती। दोस्तों के साथ नीम, इमली,आम के कई नन्हें पौधें गोबर के ढ़ेर व रुखड़े पर से निकाल कर… Continue

Posted on February 7, 2016 at 3:15am — 6 Comments

 
 
 

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