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बचपन (लघुकथा)~शीतांशु

1 ||बचपन||

मैं मध्य अवकाश के बाद हमेशा स्कूल से छूमंतर हो जाता । दीदी, अक्सर बैग उठाकर लाती । और घर पर मुँह बंद रखने के बदले मुझसे चॉकलेट जरूर लेती थी। किन्तु मैं बेफिक्र होकर कभी फूलों के लिए 'चम्पा की बॉडी', बेर के लिए नरसिंग टेकड़ी, तो कभी पिकनिक मनाने 'भेडलेश्वर-बड़दख्खन' के बाग में , नदी किनारे चले जाते था। और ठीक स्कूल छूट्टी के समय पर घर लौट आने का क्रम चलता रहा। मैडम की शिकायत भी दीदी संभाल लेती। दोस्तों के साथ नीम, इमली,आम के कई नन्हें पौधें गोबर के ढ़ेर व रुखड़े पर से निकाल कर स्कूल के पीछे वाली खाली जगह पर बो देते। स्कूल में मन नहीँ लगता । आज तितली के पीछे भागते- भागते गिर गया। कलाई पर हल्की मोच आई, घड़ी भी गुम हो गई, पर तितली को पकड़ लिया था। उसके रंग बिरंगे पंख मन को सुकून दे रहे थे। आखिर उसकी मेरी पसंद भी तो एक ही है। फूल व प्रकृति ! उसे पाकर मैं समय व चोट का दर्द भी भूल गया।
तितली को माचिस की डिब्बी में रख लिया। सोच रहा था 'आज दीदी को ये प्यारी सी गिफ्ट दूँगा। बहुत खुश होगी।'
जब मैं समय पर न आया, तो दीदी काफ़ी देर इंतजार कर घर चली गई।
माँ चिंतित । 'सन्जू जाने कहाँ गया भटक रहा होगा?'
''चल छोरी देखकर आते है। "
'माँ वो है भैया, बगीचे में!'
माँ ने दौड़ कर गले लगा लिया माँ, घर ले जाती उससे पहले मैडम ने पापा के सामने मेरा पूरा कच्चा चिट्ठा खोल कर रख दिया। पापा आग बबूला हो गए।
"कहाँ घूमते रहता है??" 'आज पूरे परिवार की नाक कटवा दी। अपनी दीदी से कुछ सीख ले।'
'वोs s मैं s s दीइ इ के लिए ....'और ये हाथ में क्या छिपा रखा है..? (झपटते हुए) ""छोड़ ऐ तितली के चक्कर इतना बड़ा हो गया।"
'आठवी बोर्ड है! पढ़ाई कर पढाई!' 'अभी बचपन न गया।' 'तेरी माँ ने सर पर बैठा रखा है।'
'फेल हुआ तो सीधे बोर्डिग स्कूल में डाल दूँगा।'
मेरे हाथ से तितली वाली डिब्बी लेकर , हाथों में जीवन सवांरने की पुस्तक थमा दी।
'पापा ने तितली को आजाद कर दिया, और मेरा बचपन उस दिन से अतीत में कैद कर दिया।"

मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 9, 2016 at 1:17am

आदरणीय विजय जी, इस बेहतरीन प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई निवेदित है. सादर 

Comment by pratibha pande on February 8, 2016 at 10:18pm

बचपन खोजती सुन्दर कथा ,हार्दिक बधाई आदरणीय विजय जी 

Comment by Nita Kasar on February 8, 2016 at 3:07pm
भविष्य सँवारने के फेर में कुछ माता पिता बच्चों से उनका बचपन छीन लेते है ।बच्चे तो नटखट शैतान होते है उन्है बचपन जीने का अवसर मिलना चाहिये बेहद सार्थक कथा के लिये बधाई आद०विजय जोशी जी ।
Comment by Rahila on February 7, 2016 at 7:50pm
आपकी इस लघुकथा ने मुझे मेरा बचपन याद दिला दिया जब मैं भी अपने छोटे भाई के साथ कुछ इसी तरह की शरारतों में मस्त थी।लेकिन ये बात मेरे वालिदैन को आज भी पता नहीं है । बहुत बधाई आदरणीय सर जी आपको । सादर प्रणाम
Comment by Samar kabeer on February 7, 2016 at 5:32pm
जनाब विजय जोशी जी आदाब,इस शानदार प्रस्तुति के लिये बधाई स्वीकार करें !
Comment by TEJ VEER SINGH on February 7, 2016 at 12:01pm

हार्दिक बधाई आदरणीय विजय जोशी जी!बहुत ही मार्मिक लघुकथा !बेहतरीन प्रस्तुति!

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