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Neeraj tripathi's Blog – February 2011 Archive (8)

कभी भी तम नहीं होता

रगों में गम नहीं होता, ये चेहरा नम नहीं होता;
तड़पती झील के आँचल में पानी कम नहीं होता;
जो बजती रागिनी थी उन हवाओं कि दिशाओं से;
अभी भी सत्य ही होता, महज़ ये भ्रम नहीं होता;
ज़रा सा उस समय मुहं मोड़ कर जो तुम नहीं मुड़ते;
विवशताओं की घाटी में कभी भी तम नहीं होता.

Added by neeraj tripathi on February 23, 2011 at 3:40pm — 2 Comments

क्या मन में ढूँढा था

कभी पर्वत पे ढूँढा था, कभी मधुबन में ढूँढा था;



शहर से दूर जाकर के घटा औ घन में ढूँढा था;



अमीरों की हवेली में, तुम्हे निर्धन में ढूँढा था;



दिवस की आंच में भी और रात के तम में ढूँढा था;



कहाँ तुम खो गए थे प्रिय तुम्हे हर जन में ढूँढा था.







मुझे प्रिय ढूँढने में हाय इतनी क्यों मशक्कत की;



मैं खोया ही कहाँ था जो ज़माने भर में खोजे तुम;



जगह की दूरियों को नापने में क्यों भटकते थे;



सदा से था तुम्हारे पास… Continue

Added by neeraj tripathi on February 19, 2011 at 12:52pm — No Comments

एक मिश्रण

इक और गुज़रा दिन समेटा याद में इसको;

...दफ़न हो जाएँगी अब ये मेरे मन कि दराजों में;

जो आये वक़्त परिचित तब मिलेगी रूह फिर इनको;

नहीं तो सिलवटें पड़ती रहेंगी इन मजारों में.

-----------------------------------------------------------------------------------------

वेदना कुछ भी नहीं, तब ह्रदय इतना मौन क्यों है;

क्यों हम अब भी स्वप्नते हैं, स्मृतियाँ भूली भुलाई ;

आस भी है, प्यास भी है, रौशनी कुछ ख़ास भी है;

मन हैं इतने पास अपने, हाथ लेकिन दूर क्यों… Continue

Added by neeraj tripathi on February 15, 2011 at 4:07pm — No Comments

आओ थोड़ा सा व्यर्थ जियें

अपनों से दिल की बात, सुनहरी आँखों के ज़ज्बात;

बारिश में भी साथ, तुम्हारे हाथों में इक हाथ ;

चाँद की उजियारी रात, भोर के आने की सौगात;

जब सब बेगाना लगता हो.......

तो वापस जाना वहीँ, जहाँ तुम ह्रदय गंवाया करते थे;

जब दिल में कोई बात न थी, तब भी हकलाया करते थे;

जब आँखों पर चश्मा डाले, तुम तारे रोज़ गिनाते…
Continue

Added by neeraj tripathi on February 9, 2011 at 4:33pm — No Comments

बड़े सामान्य से दिन हैं

बड़े सामान्य से दिन हैं ....

बेमौसम बारिशें हैं,

और सांझ की बयार में ख्वाहिशें हैं,

वही सहमी सी धूप है,

और कहीं इसमें गुमसुम,

छांव का इक रूप है,

वही चंचल से वृक्ष हैं,

और बहती हवा के साथ निष्पक्ष हैं,

वही हैं चेहरे....जाने पहचाने,

और छुपे हुए उनमे रंग,

कितने अनजाने,

वही हैं मुरादें अब भी....मन में,

और जानता है मस्तिष्क,

नहीं होंगी ये पूरी,

इस जीवन में.

बड़े सामान्य से दिन हैं ....

Added by neeraj tripathi on February 9, 2011 at 4:31pm — 1 Comment

भौगोलिक दूरियां

बड़ा बेमानी लगता है;



सुबह जो मेरे घर कि जब कहीं की सांझ होती है,







यहाँ पर सूर्य इतराता है, शाखाओं से पेड़ों की,



वहां मदहोश होने की, चाँद की तैयारी होती है,



यहाँ पर आँख खुलती है, लिहाफों के घरोंदो में,



वहां बुझती सी पलकों पर नींदें भारी होती हैं,



ये दूरी है समय की या धरा भूगोल ऐसा है,



की जगना दो घरों का साथ में, दुशवारी होती है,…

Continue

Added by neeraj tripathi on February 9, 2011 at 4:28pm — No Comments

ये ख़ामोशी तुम्हारी

खामोशी तोड़ सकती है, ख़ामोशी जोड़ सकती है,
किसी बहके से रिश्ते को ख़ामोशी मोड़ सकती है,
खामोश रहता मैं अगर इससे सुकून मिलता,
तुम्हारी पर ये ख़ामोशी मेरा दम तोड़ सकती है.

बहुत कम दिन बचे हैं अब हमारे पास ओ प्रियतम,
कहीं खामोश न रहते हुए निकले हमारा दम,
अगर मिलना न हो हमसे तो बेशक न कभी मिलना,
इक बार हंसकर देख ही लो दर्द होगा कम. 

Added by neeraj tripathi on February 9, 2011 at 11:16am — 1 Comment

ये बदलता स्वरुप

जब बेटे की जिद्द,



माँ के वात्सल्य काजल को,



आँखों से पहले ही रोक लेती है......


जब पिता का…
Continue

Added by neeraj tripathi on February 9, 2011 at 11:14am — 1 Comment

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