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Sushil Sarna's Blog – February 2025 Archive (8)

दोहा पंचक. . . . . उमर

दोहा पंचक. . . . .  उमर

बहुत छुपाया हो गई, व्यक्त उमर की पीर ।

झुर्री में रुक- रुक चला, व्यथित नयन का नीर ।।

साथ उमर के काल का, साया चलता साथ ।

अकस्मात ही छोड़ती, साँस देह का हाथ ।।

बैठे-बैठे सोचती, उमर पुरातन काल ।

शैशव यौवन सब गया, बदली जीवन चाल ।।

दौड़ी जाती जिंदगी, ओझल है ठहराव ।

यादें बीती उम्र की, आँखों में दें  स्राव ।।

साथ उमर के हो गए, क्षीण सभी संबंध ।

विचलित करती है बहुत, बीते युग की गंध ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on February 28, 2025 at 6:02pm — 4 Comments

कुंडलिया. . .

कुंडलिया. . . .

जीना  है  तो  सीख  ले ,विष  पीने  का  ढंग ।
बड़े  कसैले   प्रीति  के,अब  लगते   हैं   रंग ।।
अब  लगते  हैं  रंग , जगत् में  छलिया  सारे ।
पल - पल बदलें रूप, स्वयं का साँझ सकारे ।।
बड़ा कठिन  है  सोम, भरोसे  का  यों  पीना ।
विष को जीवन  मान , पड़ेगा  यों  ही  जीना ।।

सुशील सरना / 27-2-25

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on February 27, 2025 at 8:52pm — 6 Comments

दोहा पंचक. . . . .नवयुग

दोहा पंचक. . . . नवयुग

प्रीति दुर्ग में वासना, फैलाती दुर्गन्ध ।

चूनर उतरी लाज की, बंध हुए निर्बंध ।।

पानी सूखा आँख का, न्यून हुए परिधान ।

बेशर्मी हावी हुई, भूले देना मान ।।

सार्वजनिक अश्लीलता, फैली पैर पसार ।

पश्चिम की यह सभ्यता, लील रही संस्कार ।।

पश्चिम के परिधान का, फैला ऐसा रोग ।

नवयुग  ने बस प्यार को, समझा केवल भोग ।।

अवनत जीवन के हुए, पावन सब प्रतिमान ।

भोग पिपासा आज के, नवयुग की पहचान ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on February 21, 2025 at 8:29pm — No Comments

दोहा सप्तक. . . . . . अभिसार

दोहा सप्तक. . . . . .  अभिसार

पलक झपकते हो गया, निष्ठुर मौन प्रभात ।

करनी थी उनसे अभी, पागल दिल की बात ।।

विभावरी ढलने लगी, बढ़े मिलन के ज्वार ।

मौन चाँद तकने लगा, लाज भरे अभिसार ।।

लगा लीलने मौन को, दो साँसों का शोर ।

रही तिमिर में रेंगती, हौले-हौले भोर ।।

अद्भुत होता प्यार का, अनबोला संवाद ।

अभिसारों में करवटें, लेता फिर  उन्माद ।।

प्रतिबंधों की तोड़ता, साँकल मौन प्रभात ।

रुखसारों पर लाज की, रह जाती सौगात ।।

कुसुमित मन…

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Added by Sushil Sarna on February 17, 2025 at 3:58pm — No Comments

दोहा दशम. . . . उल्फत

दोहा दशम - ..... उल्फत

अश्कों से जब धो लिए, हमने दिल के दाग ।

तारीकी में जल  उठे, बुझते हुए चिराग ।।

ख्वाब अधूरे कह गए, उल्फत के सब राज ।

अनसुनी वो कर गए, इस दिल की आवाज ।।

आँसू, आहें, हिचकियाँ, उल्फत के  ईनाम ।

नींदों से ली दुश्मनी, और हुए बदनाम ।।

माना उनकी बात का, दिल को नहीं यकीन ।

आयें अगर न ख्वाब है, उल्फत की तौहीन ।।

यादों से हों यारियाँ , तनहाई से प्यार ।

उल्फत का अंजाम बस , इतना सा है यार ।।

मिला इश्क को हुस्न से,…

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Added by Sushil Sarna on February 10, 2025 at 1:04pm — 3 Comments

दोहा पंचक. . . शृंगार

रैन स्वप्न की उर्वशी, मौन प्रणय की प्यास ।

नैन ढूँढते नैन में, तृषित हृदय मधुमास ।।

 

वातायन की ओट से, हुए नैन संवाद ।

अरुणिम नजरों में हुए, लक्षित फिर उन्माद ।

 

मृग शावक सी चाल है,  अरुणोदय से गाल ।

सर्वोत्तम यह सृष्टि की, रचना बड़ी कमाल ।।

 

गौर वर्ण झीने वसन, मादकता भरपूर ।

जैसे हो यह सृष्टि का, अलबेला दस्तूर ।।

 

जब-जब दमके दामिनी, उठे मिलन की प्यास।

अन्तस में व्याकुल रहा, बांहों का मधुमास…

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Added by Sushil Sarna on February 4, 2025 at 9:30pm — No Comments

कुंडलिया. . .

कुंडलिया. . .

मन से मन का हो गया, मन ही मन अभिसार ।
मन में  मन  के प्रेम  का, सृजित  हुआ संसार ।
सृजित हुआ संसार , हाथ  की  चूड़ी  खनकी ।
मुखर हुआ शृंगार , बात फिर निकली मन की ।
बंध  हुए  निर्बंध ,भाव   सब   निकले  तन  से ।
मन  ने  दी  सौगात , प्रीति  को  सच्चे  मन से ।

सुशील सरना / 2-2-25

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on February 2, 2025 at 5:05pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . संबंध

दोहा पंचक. . . . संबंध

अर्थ लोभ की रार में, मिटा खून का प्यार ।

रिश्ते सब  आहत  हुए, शेष  रही तकरार ।।

वाणी  कर्कश  हो  गई, मिटी नैन से लाज ।

संबंधों में स्वार्थ की, मुखर हुई आवाज ।।

प्यार मिटा पैदा हुई, रिश्तों में तकरार ।

फीके - फीके  हो गए, जीवन  के  त्योहार ।।

दिखने को ऐसा लगे, जैसे सब हों साथ ।

वक्त पड़े तो छोड़ता, खून, खून का हाथ ।।

आपस में ऐसे मिलें, जैसे हों मजबूर ।

निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर ।।…

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Added by Sushil Sarna on February 1, 2025 at 2:24pm — No Comments

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