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सुरेश कुमार 'कल्याण''s Blog – April 2016 Archive (5)

जिन्दगी का सफर

जिन्दगी के सफर पर
बढते रहो, मगर
किसी की राह मत देखो।
अपने कदमों के निशां
छोडते चलो।
उन्हीं कदमचिन्हों पर
बन जाएगा कारवां
एक दिन।
गमों की परवाह
मत करो, मगर
अधिक खुशियों से
तुम जरूर डरना।
खुशियों के साथ
गम
याद करते चलो।
अपने कदमों के निशां
छोडते चलो।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on April 26, 2016 at 8:29pm — 4 Comments

बता प्यार पाने किधर जाएं

डूबे हैं जो इश्क-ए-वतन में
बता प्यार पाने किधर जाएं।

भरा है अपने नैनों में पानी
बता दीदार पाने किधर जाएं।

जो तलवार न कर पाए जंगे इश्क में
इक नजर का नजारा उसको कर जाए।


माटी की महक के दीवाने जो हैं
बता तुझे छोडकर किधर जाएं।

इक दफा गुलाबों सा मुस्कुरा देना
तमन्ना है कि जिन्दगी संवर जाए।

मेहरबान रहना हमपे ए इश्के वतन
हौले-हौले शायद ये जिंदगी गुजर जाए।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on April 23, 2016 at 11:08am — 4 Comments

सेल्फी विद डाॅटर

दोपहर का समय था।सूर्य की प्रचंड किरणें आग के गोले बरसा रही थी।रश्मि अभी-अभी काॅलेज से आई थी, जबकि रूपेश अपने आॅफिस से पहले ही आ चुका था।



परंतु आते ही आज फिर वही बात हो गई जो प्रायः इस समय घटित होती थी।प्रतिदिन लडाई जूते-चप्पलों को सही जगह पर रखने को लेकर होती थी।ज्योंही रश्मि ने रूपेश के जूतों को बैडरूम में देखा तो वह भडक उठी।

"अपने आप को एक मैनेजिंग डायरेक्टर कहते हुए शर्म नहीं आती, न जाने अपने जूतों को भी सही जगह पर मैनेज करना सिखोगे_ _ _ _।"

"तुम किसलिए हो? इतना भी…

Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on April 14, 2016 at 9:30am — 10 Comments

तेरा इंतजार करते-करते (कविता)

ए हसीन लम्हे

जरा आहिस्ता गुजर,

बहुत बरस बिताए हैं

तेरा इंतजार करते-करते।



बहुत तडपे हैं

बहुत रोए हैं

आंसू भी खूब बहाए हैं

हमने आहें भरते-भरते।

बहुत बरस_ _ _ _।



हठ किया है हमने

बादलों से निकलते

चांद की तरह

यहां तक पहुंचे हैं हम

जमाने की नजरों से

डरते- डरते।

बहुत बरस_ _ _ _।



जाने क्या तडप थी

जाने क्या एहसास था

जिंदगी जी आज तक

हमने यूंही मरते-मरते।

बहुत बरस_ _ _ _।



मौलिक… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on April 12, 2016 at 9:27am — 2 Comments

अपने

उनकी क्या बात करूँ,

मैं अपनी ही सुनाता हूँ।

भाव-भंगिमा थी क्या उनकी,

मैं अपनी पर इतराता हूँ।

पसीना आए या खून बहे,

पर उनका क्या जाता है?

लूट लिया उन्होंने मुझको,

मुझे लुटना भी भाता है।

मीठी-मीठी वाणी से,

लूट हाड-मांस का सार लिया।

अपने पराये हो गए,

बिगाड सारा परिवार दिया।

धन-दौलत की क्या बात करूँ,

वो तो उनके पास रही।

क्या लेना मुझको था उससे,

वो गले में पडके खाक रही।

है अच्छाई और बुराई क्या,

मैं समझ नहीं पाता… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on April 11, 2016 at 5:06pm — 2 Comments

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