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सालिक गणवीर's Blog – June 2020 Archive (5)

ग़ज़ल ( जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी...)

(221 2121 1221 212)

जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी

हँस,खेल,मुस्कुरा तू क़ज़ा से न डर अभी

आयेंगे अच्छे दिन भी कभी तो हयात में

मर-मर के जी रहे हैं यहाँ क्यूँँ बशर अभी

हम वो नहीं हुज़ूर जो डर जाएँँ चोट से

हमने तो ओखली में दिया ख़ुद ही सर अभी

सच बोलने की उसको सज़ा मिल ही जाएगी 

उस पर गड़ी हुई है सभी की नज़र अभी

हँस लूँ या मुस्कुराऊँ , लगाऊँ मैं क़हक़हे

ग़लती से आ गई है ख़ुशी मेरे घर…

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Added by सालिक गणवीर on June 30, 2020 at 8:00am — 14 Comments

ग़ज़ल ( ज़िंदगी में तेरी हम शामिल नहीं.....)

( 2122 2122 212 )

ज़िंदगी में तेरी हम शामिल नहीं

तूने समझा हमको इस क़ाबिल नहीं

जान मेरी कैसे ले सकता है वो

दोस्त है मेरा कोई क़ातिल नहीं

सारी तैयारी तो मैंने की मगर

जश्न में ख़ुद मैं ही अब शामिल नहींं

हमको जिस पर था किनारे का गुमाँ

वो भंवर था दोस्तो साहिल नहीं

सोच कर हैरत ज़दा हूँ दोस्तो

साँप तो दिखते हैं लेकिन बिल नहीं

देखने में है तो मेरे यार - सा

उसके होटों के किनारे तिल…

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Added by सालिक गणवीर on June 17, 2020 at 11:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल ( अभी जो है वही सच है....)

(1222 1222 1222 1222)

अभी जो है वही सच है तेरे मेरे फ़साने में

अबद तक कौन रहता है सलामत इस ज़माने में

तड़पता देख कर मुझको सड़क पर वो नहीं रूकता

कहीं झुकना न पड़ जाए उसे मुझको उठाने में

गले का दर्द सुनते हैं वो पल में ठीक करता है

महारत भी जिसे हासिल है आवाज़ें दबाने में

किसी दिन टूट जाएँगी ये चट्टानें खड़ी हैं जो

लगेगा वक़्त शीशे को हमें पत्थर बनाने में

अजब महबूब है मेरा जो पल में रुठ जाता है

महीने बीत…

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Added by सालिक गणवीर on June 13, 2020 at 2:00pm — 12 Comments

ग़ज़ल ( कितनी सियाह रातों में.....)

( 2212 122 2212 122)

कितनी सियाह रातों में हम बहा चुके हैं

ये अश्क फिर भी देखो आंँखों में आ चुके हैं

गर आके देख लो तो गड्ढे भी न मिलेंगे

हाँ,लोग काग़ज़ों पर नहरें बना चुके हैं

अब खिलखिला रहे हैं सब लोग महफ़िलों में

मतलब है साफ सारे मातम मना चुके हैं

वो ख़्वाब सुब्ह का था इस बार झूठ निकला

ता'बीर के लिए हम नींदें उड़ा चुके हैं

अब पाप का यहाँ पर नाम-ओ-निशांँ नहीं है

सब लोग शह्र के अब गंगा नहा चुके…

Continue

Added by सालिक गणवीर on June 9, 2020 at 4:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल ( दूर की रौशनी से क्या कहते..)

(2122 1212 22)

दूर की रौशनी से क्या कहते

था अंधेरा किसी से क्या कहते

जगमगाती सियाह रातों में

दर्द की चांदनी से क्या कहते

सारा पानी किसी ने रोका था

बेवजह हम नदी से क्या कहते

सामने उसके गिड़गिड़ाए थे

उसके खाता-बही से क्या कहते

अब वो हैवान बन गया तो फ़िर

हम उसी आदमी से क्या कहते

पी गए ख़ूं भी लोग सहरा में

आलमे-तिश्नगी से क्या कहते

तेरी गलियाँ तुझे मुबारक हो …

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Added by सालिक गणवीर on June 7, 2020 at 4:30pm — 7 Comments

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