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Sushil Sarna's Blog – June 2024 Archive (5)

दोहे आज के. . . .

दोहे आज के .....

बिगड़े हुए समाज का, बोलो दोषी कौन ।

संस्कारों के ह्रास पर, आखिर हम क्यों मौन ।।

संस्कारों को आजकल, भला पूछता कौन ।

नंगेपन  के प्रश्न पर,  आखिर हम क्यों मौन ।।

नर -नारी के मध्य अब, नहीं शरम की रेख ।

खुलेआम अभिसार का, देख तमाशा देख ।।

सरेआम अब हो रहा, काम दृष्टि का खेल ।

युवा वर्ग में आम अब, हुआ अधर का मेल ।।

सभी तमाशा देखते, कौन करे प्रतिरोध ।

कल के बिगड़े रंग का, नहीं किसी को बोध ।।

कर में कर को थाम कर, चले…

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Added by Sushil Sarna on June 27, 2024 at 9:27pm — No Comments

दोहा सप्तक. . . सच-झूठ

दोहे सप्तक . . . . . सच-झूठ



अभिव्यक्ति सच की लगे, जैसे नंगा तार ।

सफल वही जो झूठ का, करता है व्यापार ।।

झूठों के बाजार में, सत्य खड़ा लाचार ।

असली की साँसें घुटें, आडम्बर भरमार ।।

आकर्षक है झूठ का, चकाचौंध संसार ।

निश्चित लेकिन झूठ की, किस्मत में है हार ।।

सच के आँगन में उगी, अविश्वास की घास ।

उठा दिया है झूठ ने, सच पर से विश्वास ।।

झूठ जगाता आस को, सच लगता आभास ।

मरीचिका में झूठ की, सिर्फ प्यास ही प्यास ।।

सत्य पुष्प पर झूठ…

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Added by Sushil Sarna on June 18, 2024 at 9:13pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . .सागर

दोहा पंचक. . . सागर

उठते हैं जब गर्भ से, सागर के तूफान ।

मिट जाते हैं रेत में, लहरों के अरमान ।।

लहर- लहर में  रेत पर, मचलें सौ अरमान ।

मौन तटों पर प्रेम की, रह जाती पहचान ।।

छलकी आँखें देख कर, सूना सागर तीर ।

किसके  अश्कों ने  किया, खारा सागर नीर ।।

कौन बनाता है भला, सागर तीर मकान ।

अरमानों को लीलता,  इसका हर तूफान ।।

देखा पीछे पर कहाँ, जाने गए निशान ।

हर वादे को दे गया, घाव एक तूफान ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on June 10, 2024 at 1:00pm — 6 Comments

दोहा सप्तक ..रिश्ते

दोहा सप्तक. . . . . रिश्ते

रिश्ते नकली फूल से, देते नहीं सुगंध ।

अर्थ रार में खो  गए, आपस के संबंध ।।

रिश्तों के माधुर्य में, आने लगी खटास ।

मिलने की  ओझल हुई, संबंधों में प्यास ।।

गैरों से रिश्ते बने, अपनों से हैं दूर ।

खून खून से अब हुआ, मिलने से मजबूर ।।

झूठी हैं अनुभूतियाँ , कृत्रिम हुई मिठास ।

रिश्तों को आते नहीं, अब रिश्ते ही रास ।।

आँगन में खिंचने लगी, नफरत की दीवार ।

रिश्तों की गरिमा…

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Added by Sushil Sarna on June 7, 2024 at 8:30pm — 6 Comments

दोहा पंचक. . . . .दम्भ

दोहा पंचक. . . . . दम्भ

हर दम्भी के दम्भ का, सूरज होता अस्त ।

रावण जैसे सूरमा, होते देखे पस्त । ।

दम्भी को मिलता नहीं, जीवन में सम्मान ।

दम्भ कुचलता जिंदगी, की असली पहचान ।।

हर दम्भी को दम्भ की, लगे सुहानी नाद ।

इसके मद में चूर वो, बन जाता सैयाद ।।

दम्भ शूल व्यक्तित्व का, इसका नहीं निदान ।

आडम्बर के खोल में, जीता वो इंसान ।।

दम्भी करता स्वयं का, सदा स्वयं अभिषेक ।

मैं- मैं को जीता सदा, अपना हरे…

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Added by Sushil Sarna on June 2, 2024 at 6:56pm — No Comments

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