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Sushil Sarna's Blog (902)

दोहा पंचक. . . . .इसरार

दोहा पंचक. . . .  इसरार

लब से लब का फासला, दिल को नहीं कबूल ।

उल्फत में चलते नहीं, अश्कों भरे उसूल ।।

रुखसारों पर रह गए, कुछ ऐसे अल्फाज ।

तारीकी के खुल गए, वस्ल भरे सब राज ।।

जुल्फों की चिलमन हटी ,हया हुई मजबूर ।

तारीकी में लम्स का, बढ़ता रहा सुरूर ।।

ख्वाब हकीकत से लगे, बहका दिल नादान ।

बढ़ी करीबी इस कदर, मचल उठे अरमान  ।।

खामोशी दुश्मन बनी , टूटे सब इंकार ।

दिल ने कुबूल कर लिए, दिल के सब इसरार ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on September 15, 2025 at 8:57pm — 2 Comments

दोहा दशम्. . . . . गुरु

दोहा दशम्. . . . गुरु

शिक्षक शिल्पी आज को, देता नव आकार ।

नव युग के हर स्वप्न को, करता वह साकार ।।

बिना स्वार्थ के बाँटता, शिक्षक अपना ज्ञान ।

गढ़े ज्ञान से वह सदा, एक सभ्य  इंसान ।।

गुरुवर  अपने  ज्ञान से , करते अमर प्रकाश ।

राह दिखाते सत्य की, करते तम का नाश ।।

शिक्षक करता ज्ञान से , शिष्यों का उद्धार ।

लक्ष्य ज्ञान से सींचता,  उनका नव संसार ।।

गुरु बिन संभव ही नहीं, जीवन का उत्थान ।

पैनी छेनी ज्ञान की, गढ़ती नव पहचान…

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Added by Sushil Sarna on September 5, 2025 at 3:00pm — 2 Comments

दोहा सप्तक. . . नजर

नजरें मंडी हो गईं, नजर हुई  लाचार ।

नजरों में ही बिक गया, एक जिस्म सौ बार ।।

 

नजरों से छुपता नहीं,कभी नजर का प्यार ।

उठी नजर इंकार तो, झुकी नजर  इकरार ।।

 

नजरें समझें जो हुए, नजरों से संवाद ।

बिन बोले ही बोलते , नजरों के उन्माद ।।

 

नजरों को झूठी लगे, नजरों की मनुहार ।

कामुकता से है भरा, नजरों का संसार ।

 

नजरें ही करने लगी, नजरों से व्यापार ।

नजर पाश में हो गई, नजर बड़ी लाचार  ।।

 

नजरों…

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Added by Sushil Sarna on August 31, 2025 at 3:00pm — 7 Comments

कुंडलिया. . . . .

कुंडलिया. . .

चमकी चाँदी  केश  में, कहे उम्र  का खेल ।
स्याह केश  लौटें  नहीं, खूब   लगाओ  तेल ।
खूब  लगाओ  तेल , वक्त  कब  लौटे  बीता ।
भला उम्र की दौड़ , कौन है आखिर जीता ।
चौंकी बढ़ती  उम्र , जरा जो बिजली दमकी ।
व्यग्र  करें  वो  केश , जहाँ पर चाँदी चमकी ।

सुशील सरना / 22-8-25

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on August 22, 2025 at 1:30pm — 2 Comments

दोहा सप्तक. . . . . विविध

मंजिल हर सोपान की, केवल है  अवसान ।

मुश्किल है पहचानना, जीवन के सोपान ।।

 

छोटी-छोटी बात पर, होने लगे तलाक ।

पल में टूटें आजकल, रिश्ते सारे पाक ।।

 

छोटे से परिवार में, सीमित  है औलाद ।

उस पर भी होते नहीं, आपस में संवाद ।।

 

पति-पत्नी के प्रेम का, अजब हुआ है हाल ।

प्रेम जाल में गैर के, दोनों हुए हलाल ।।

 

कत्ल प्रेम में आजकल, हर दिन  होते आम ।

नाता जोड़ें गैर से, फिर होते बदनाम ।।

 

धोखा…

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Added by Sushil Sarna on August 19, 2025 at 3:00pm — 6 Comments

कुंडलिया. . . .

 

धोते -धोते पाप को, थकी गंग की धार ।
कैसे होगा जीव का, इस जग में उद्धार ।
इस जग में उद्धार , धर्म से रिश्ते झूठे ।
मन में भोग-विलास, आचरण दिखें अनूठे ।
कर्मों के परिणाम , देख फिर हरदम रोते ।
करें न मन को शुद्ध , गंग में बस तन धोते ।

सुशील सरना / 10-8-25

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on August 10, 2025 at 7:00pm — 4 Comments

दोहा पंचक. . . अपनत्व

दोहा पंचक. . . . .  अपनत्व

अपनों से मिलता नहीं,  अब अपनों सा प्यार ।

बदल गया है  आजकल,  आपस का व्यवहार ।।

अपने छूटे द्वेष में, कल्पित है व्यवहार ।

तनहा जीवन ढूँढता, अपनों का संसार ।।

क्षरण हुआ विश्वास का, बिखर गए संबंध ।

कहीं शून्य में खो  गई, अपनेपन की गंध ।।

तोड़ सको तो तोड़ दो, नफरत की दीवार ।

इसके पीछे है छुपा, अपनों का संसार ।।

आपस में अपनत्व का, उचित नहीं पाखंड ।

रिश्तों को अलगाव का, फिर मिलता है दंड ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on May 7, 2025 at 4:41pm — 15 Comments

दोहा पंचक. . . नया जमाना

दोहा पंचक. . . . . नया जमाना

अपने- अपने ढंग से, अब जीते हैं लोग ।

नया जमाना मानता, जीवन को अब भोग ।।

 मुक्त आचरण ने दिया, जीवन को वो रूप ।

जाने कैसे ढल गई, संस्कारों की धूप ।।

मर्यादा  ओझल हुई, सिमट गए परिधान ।

नया जमाना मानता, बेशर्मी को शान ।।

सार्वजनिक अश्लीलता, फैली पैर पसार ।

नयी सभ्यता ने दिया, खूब इसे विस्तार ।।

निजी पलों का आजकल, नहीं रहा अब मोल ।

रहा मौन को देखिए, नया जमाना खोल ।।

सुशील सरना / 6-5-25

मौलिक…

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Added by Sushil Sarna on May 6, 2025 at 8:40pm — No Comments

दोहा दशम -. . . . . शाश्वत सत्य

दोहा दशम -. . .  शाश्वत सत्य

बंजारे सी जिंदगी, ढूँढे अपना गाँव ।

मरघट में जाकर रुकें , उसके चलते पाँव ।।

किसने जाना आज तक, विधना रचित विधान ।

उसका जीवन पृष्ठ है  , आदि संग अवसान ।।

जाने कितने छोड़ कर, मोड़ मिला वो अंत ।

जहाँ मोक्ष का ध्यान कर , देह त्यागते संत ।।

मरघट का संसार में, कोई नहीं विकल्प ।

कितनी भी कोशिश करो, ,बढ़ें  न साँसें अल्प ।।

जीवन भर मिलता नहीं, साँसों को विश्राम ।

थम जाती है जिंदगी, जब हो अन्तिम शाम…

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Added by Sushil Sarna on May 3, 2025 at 6:00pm — 6 Comments

दोहा सप्तक. . . . विविध

दोहा सप्तक. . . . विविध

कह दूँ मन की बात या, सुनूँ तुम्हारी बात ।

क्या जाने कल वक्त के, कैसे हों हालात ।।

गले लगाकर मौन को, क्यों बैठे चुपचाप ।

आखिर किसकी याद में, अश्क बहाऐं आप ।।

बहुत मचा है आपकी. खामोशी का शोर ।

भीगे किसकी याद से, दो आँखों के कोर ।।

मन मचला जिसके लिए, कब समझा वह पीर ।

बह निकला चुपचाप फिर, विरह व्यथा का नीर ।।

दो दिल अक्सर प्यार में, होते हैं मजबूर ।

कुछ पल चलते साथ फिर, हो जाते वह दूर ।।

कहते हैं मजबूरियाँ,…

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Added by Sushil Sarna on May 1, 2025 at 12:52pm — 2 Comments

दोहा सप्तक. . . लक्ष्य

दोहा सप्तक. . . . . लक्ष्य

कैसे क्यों को  छोड़  कर, करते रहो  प्रयास ।

लक्ष्य  भेद  का मंत्र है, मन  में  दृढ़  विश्वास ।।

करते  हैं  जो जीत से, लक्ष्यों का शृंगार ।

उनको जीवन में कभी, हार नहीं स्वीकार ।।

आज किया कल फिर करें, लक्ष्य हेतु संघर्ष ।

प्रतिफल है प्रयासों का , लक्ष्य प्राप्ति पर हर्ष ।।

देता है संघर्ष ही, जीवन को उत्कर्ष ।

आज नहीं तो जीत का, कल छलकेगा  हर्ष ।।

सच्ची कोशिश हो अगर, मंज़िल आती पास ।

मिल जाता संघर्ष को,…

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Added by Sushil Sarna on April 30, 2025 at 7:30pm — 6 Comments

दोहा षष्ठक. . . . आतंक

 

नहीं दरिन्दे जानते , क्या होता सिन्दूर ।

जिसे मिटाया था किसी ,  आँखों का वह नूर ।।

 

पहलगाम से आ गई, पुलवामा की याद ।

जख्मों से फिर दर्द का, रिसने लगा मवाद ।।

 

कितना खूनी हो गया, आतंकी उन्माद ।

हर दिल में अब गूँजता,बदले का संवाद ।।

 

जीवन भर का दे गए, आतंकी वो घाव ।

अंतस में प्रतिशोध के, बुझते नहीं अलाव ।।

 

भारत ने सीखी नहीं, डर के आगे हार ।

दे डाली आतंक को ,खुलेआम ललकार ।।

 

कर देंगे…

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Added by Sushil Sarna on April 26, 2025 at 1:00pm — 4 Comments

दोहा सप्तक. . . उल्फत

दोहा सप्तक. . . .  उल्फत

याद अमानत बन गयी, लफ्ज हुए लाचार ।

पलकों की चिलमन हुई, अश्कों से गुलजार ।।

आँखों से होते नहीं, अक्स नूर के दूर ।

दर्द जुदाई का सहे, दिल कितना मजबूर ।।

उल्फत में रुसवाइयाँ, हासिल हुई जनाब ।

मिला दर्द का चश्म को, अश्कों भरा खिताब ।।

उलझ गए जो आँख ने, पूछे चन्द सवाल ।

खामोशी से ख्वाब का, देखा किए जमाल ।।

हर करवट महबूब की, यादों से लबरेज ।

रही सताती रात भर, गजरे वाली सेज ।।

हासिल दिल को इश्क में, ऐसी हुई किताब…

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Added by Sushil Sarna on April 18, 2025 at 5:29pm — 2 Comments

दोहा सप्तक. . . .तकदीर

दोहा सप्तक. . . . . तकदीर

 

होती है हर हाथ में, किस्मत भरी लकीर ।

उसकी रहमत के बिना, कब बदले तकदीर ।।

भाग्य भरोसे कब भला, करवट ले तकदीर ।

बिना करम के जिंदगी, जैसे लगे फकीर ।।

बिना कर्म इंसान की, बदली कब तकदीर ।

श्रम बदले संसार में, जीने की तस्वीर ।।

चाहो जो संसार में, मन वांछित परिणाम ।

नजर निशाने पर करे, संभव हर संधान ।।

भाग्य भरोसे कब हुआ, जीवन का उद्धार ।

चाबी श्रम की खोलती, किस्मत का हर द्वार ।।

बिछा हुआ हर हाथ में,…

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Added by Sushil Sarna on April 11, 2025 at 2:30pm — 2 Comments

दोहा सप्तक. . . . विरह शृंगार

दोहा सप्तक. . . . विरह शृंगार

दृगजल से लोचन भरे, व्यथित हृदय उद्गार ।

बाट जोहते दिन कटा, रैन लगे  अंगार ।।

तन में धड़कन प्रेम की, नैनन बरसे नीर ।

बैरी मन को दे गया, अनबोली वह पीर ।।

जग क्या जाने प्रेम के, कितने गहरे घाव ।

अंतस की हर पीर को, जीवित करते स्राव ।।

विरही मन में मीत की, हरदम आती याद ।

हर करवट पर मीत से, मन करता संवाद ।।

बैठ अनमनी द्वार पर, विरहन देखे राह ।

मन में उठती हूक सी , पिया मिलन की चाह ।

नैन पिया की याद…

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Added by Sushil Sarna on March 20, 2025 at 8:48pm — 4 Comments

दोहा पंचक. . . . होली

दोहा पंचक. . . . . होली

अलहड़ यौवन रंग में, ऐसा डूबा आज ।

मनचलों की टोलियाँ, खूब करें आवाज ।।

हमजोली के संग में,  खेले सजनी रंग ।

चुपके-चुपके चल रहा, यौवन का हुड़दंग ।।

पिचकारी की धार से, ऐसे बरसे रंग ।

जीजा की गुस्ताखियाँ, देख हुए सब दंग ।।

कंचन काया का किया, पति ने ऐसा हाल ।

अंग- अंग रंग में ढला, यौवन लगे कमाल ।।

पारदर्शिता देख कर, दिलवाले हैरान ।

पिचकारी के रंग से , डोल उठा  ईमान ।।



सुशील सरना / 13-3-25

मौलिक एवं…

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Added by Sushil Sarna on March 13, 2025 at 8:44pm — No Comments

दोहा सप्तक. . . .

दोहा सप्तक. . . . . रिश्ते

तार- तार रिश्ते हुए, मैला हुआ अबीर ।

प्रेम शब्द को ढूँढता, दर -दर एक फकीर ।1।

सपने टूटें आस के , खंडित हो विश्वास ।

मुरझाते रिश्ते वहाँ, जहाँ स्वार्थ का वास ।2।

देख रहा संसार में, अकस्मात अवसान ।

फिर भी बन्दा जोड़ता, विपुल व्यर्थ सामान ।3।

ऐसे टूटें आजकल, रिश्ते जैसे काँच ।

पहले जैसे प्रेम की, नहीं रही अब आँच ।4।

रिश्तों के माधुर्य में, झूठी हुई मिठास ।

मन से तो सब दूर हैं , तन से चाहे पास…

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Added by Sushil Sarna on March 3, 2025 at 4:32pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . . उमर

दोहा पंचक. . . . .  उमर

बहुत छुपाया हो गई, व्यक्त उमर की पीर ।

झुर्री में रुक- रुक चला, व्यथित नयन का नीर ।।

साथ उमर के काल का, साया चलता साथ ।

अकस्मात ही छोड़ती, साँस देह का हाथ ।।

बैठे-बैठे सोचती, उमर पुरातन काल ।

शैशव यौवन सब गया, बदली जीवन चाल ।।

दौड़ी जाती जिंदगी, ओझल है ठहराव ।

यादें बीती उम्र की, आँखों में दें  स्राव ।।

साथ उमर के हो गए, क्षीण सभी संबंध ।

विचलित करती है बहुत, बीते युग की गंध ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on February 28, 2025 at 6:02pm — 4 Comments

कुंडलिया. . .

कुंडलिया. . . .

जीना  है  तो  सीख  ले ,विष  पीने  का  ढंग ।
बड़े  कसैले   प्रीति  के,अब  लगते   हैं   रंग ।।
अब  लगते  हैं  रंग , जगत् में  छलिया  सारे ।
पल - पल बदलें रूप, स्वयं का साँझ सकारे ।।
बड़ा कठिन  है  सोम, भरोसे  का  यों  पीना ।
विष को जीवन  मान , पड़ेगा  यों  ही  जीना ।।

सुशील सरना / 27-2-25

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on February 27, 2025 at 8:52pm — 6 Comments

दोहा पंचक. . . . .नवयुग

दोहा पंचक. . . . नवयुग

प्रीति दुर्ग में वासना, फैलाती दुर्गन्ध ।

चूनर उतरी लाज की, बंध हुए निर्बंध ।।

पानी सूखा आँख का, न्यून हुए परिधान ।

बेशर्मी हावी हुई, भूले देना मान ।।

सार्वजनिक अश्लीलता, फैली पैर पसार ।

पश्चिम की यह सभ्यता, लील रही संस्कार ।।

पश्चिम के परिधान का, फैला ऐसा रोग ।

नवयुग  ने बस प्यार को, समझा केवल भोग ।।

अवनत जीवन के हुए, पावन सब प्रतिमान ।

भोग पिपासा आज के, नवयुग की पहचान ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on February 21, 2025 at 8:29pm — No Comments

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