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Amod shrivastav (bindouri)'s Blog (90)

जो भी मलाल रखते है

बहर- 2122/1212 /22

(मन में जोभी मलाल रखते हैं)

जिंदगी जो मलाल रखते है

वो नही जो खयाल रखते है



वास्ता हि नही रहा उनका

बस खयाली पुआल रखते हैं



मौत से वो रहा डरा ही है

जो भि डर मन में पाल रखते हैं



हार जो भी गया हंसी पल है

बाद चाले सभाल रखते है



इश्क में ठोकरें लगी जिनको

प्यार वो बेमिसाल रखते है



धर्म समझा कभी नही वो है

मजहबी जो दीवाल रखते हैं



बात प्यारी हसीन होठों पर

प्यार में वो मिसाल रखते… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on September 15, 2015 at 5:13pm — 14 Comments

हम है राही मुहब्बत

बहर-

212/212/212/212



हम है राही मुहब्बत बताया न कर

प्यार हैरत सें ऐसे जताया न कर

आँख बह जाने दे देख बस तू ह्रदय

भीग जाये जो दामन सुखाया न कर

जिंदगी की राह पर साथ आ हमसफ़र

पास रह के तू दूरी बनाया न कर

क़त्ल करना है तो क़त्ल कर दे मुझे

धार चाकू दिखा कर डराया न कर

जानता हूँ तू वैद्यो के घर से जुडी

दोस्ती में मेरी जखम खाया न कर

प्यार मजहब कभी भी नही देखता

यार मजहब की भाषा सिखाया…

Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on September 14, 2015 at 11:30am — 6 Comments

गजल ...चाँद तारो से कभी पूंछा नही

बहर -2122/2122/2122/212



आज हम यह सोचते है के बिछड़ कर क्या मिला

हाँ ये सच है जो मिला उसका अलग रस्ता मिला



सोचता हूँ चाँद तारों से ज़रा मै पूछ लूँ

क्या तुम्हे भी राह में जो भी मिला तन्हा मिला



आज आँगन में कही तारा नहीं यादों भरा

छिप के कोने में पड़ा घर का हँसी प्याला मिला



मौसमो की ही तरह है इश्क की आबो हवा

जब चली तो घर मेरा दरका कही टूटा मिला



देख कर अंजाम अपना मैं बहुत हैरान हूँ

चल पड़ा जिस रास्ते पर वो ग़मों से जा…

Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on August 18, 2015 at 11:00pm — 15 Comments

वीरो की धरती....

देश भक्ति गीत...01

-----------------------------------------------

वीरो की धरती में हूँ जन्मा

कायरता न करनी है

नब्ज में है खून वीरों का

रक्षा इसकी करनी है

-------------------------------------------------

न्योछावर हो जाना है हँस

तिरंगा हांथों में लिए

वीरो की क़ुरबानी की अब

लाज हमें ही रखनी है

--------------––---------------------------

वीरो की धरती में हूँ जन्मा

कायरता न करनी है…

Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on August 13, 2015 at 9:30am — 2 Comments

बेबस इमान (बेईमानी का थिल्हाव)

ईमानदारी

कही न कही

हर बार हार कर...

अकेले में मुझसे

बस

सुगबुगाते

बात करती है ...

और मन ही मन

बड़ी पंडित बन

इमान को दरिद्रा स्थित

पर

दुद्कारती है....



ईमान

अपनी परिस्थित को

चुप चाप

फटी सी साफी

में पोंछ लेता है....

और

सांसे

एक आह ले

अपनी बेज्जती सह

प्रवाह मंद कर

बहतीं हैं...

आज परिस्थित ही

ऐसी है ....

सच की ......

यह मुह उठा कर

कभी जवाब नहीं

देता… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on July 16, 2015 at 12:10am — No Comments

विद्यालय ....(भविष्य)

दरवाजे से घुसता
चला आ रहा था भविष्य ...
मेरे भारत का
कुछ भूत में बनी
पोथीयों का बोझ लादे....

निर्भीक...
निःसंशय ...
जैसे...रवि/
पूरब से अंधकार को
धकेलता चला आ रहा हो...

मुश्कुरता...
खिलखिलाता....

जैसे ......प्रकृति

लिख रही है /नए जीवन /नए मंच
/नयी आकृति
सुबह की /ताजी हवा /नया सा स्वाद ले के...


June 25 at 6:37am मौलिक अप्रकाशित

Added by amod shrivastav (bindouri) on July 16, 2015 at 12:06am — No Comments

पसीने का एक बूंद(श्रमिक संघर्ष)

पसीने काबूंद

माथे से उपज

ठिठकता /चलता या बहता

निचे की ओर

रुख और अधरों

का सरोकार करते हुए

चुमते/बिदा लेते/रु-बरु

आ पहुचा ...

ह्रदय के पास

मन में अंगड़ाई ले

कहने लगा

मुझे कबूल कर ले

बस यहीं ठहर जाउंगा.....

मृदा को मर्दित करता

श्रमिक (किसान)

धराशाई करता है

थकावट /

और पसीने की बूंद की अर्जी

लगा रहता है

कर्म और मेहनत

का बिस्वास ले

तपती/

सूखी /बंजर /

जमीं को

सींचता है

पूरा… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on July 16, 2015 at 12:02am — No Comments

कमी रह गयी...

जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई
प्यार की सब किताबे धरी रह गई

रोज मिलते रहे दर्दों गम हर गली
जिंदगी बस कड़ी की कड़ी रह गई

खामोश आँगन मेरा सुगबुगाता रहा
आँखों में बारिश की झड़ी रह गई

खुशियाँ रूठी तो बाहर निकली इस कदर
दरवाजे की कड़ी लगी रह गई

कलम उछली खुद को नचनियां समझ
प्रे म पत्रों की तबियत बिगड़ी रह गई

जस्न मनाये तो बिंदोरी मनाये किस तरह
रोशनी बस घडी दो घडी रह गई

Added by amod shrivastav (bindouri) on July 15, 2015 at 11:50pm — No Comments

.ये हवा भी किस तरफ

ये हवा भी किस तरफ चलने लगी है
हर तरफ बस मौत ही जड़ने लगी है
----
----
आज सरकारी गवाहों को मसल के
राजनीति आँगन पे हगने लगी है
----
-----
मुंडवा के जो निकल आई समझने
राजनीति चाय पे मरने लगी है
------
अप्रकाशित-----आमोद बिन्दौरी

Added by amod shrivastav (bindouri) on July 15, 2015 at 11:48pm — No Comments

गजल...दूर रह के हमें मिला क्या है

दूर रह के हमें मिला क्या है।
आज कहने दो कायदा क्या है।।

मौसमो की जुबनियाँ सुन लो।
कह रहा है जो वो नया क्या है।।

थाम सकता हूँ उसके दामन को।
प्यार जो हो गया बुरा क्या है।।

खिल खिलाया करो कभी खुलकर।
इश्क हो तुम मेरा हया क्या है।।

हम सभल जाए राहें उल्फत में
रोज मरने से फायदा क्या है।।

अप्रकाशित ...आमोद बिन्दौरी

Added by amod shrivastav (bindouri) on July 15, 2015 at 11:30pm — 5 Comments

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