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Pari M Shlok's Blog (6)

बुझ रहा है हौसला मौला

२१२ २२१२ २२

बुझ रहा है हौसला मौला

राह कोई तो दिखा मौला



नाम पे उसके छलकते हैं

आँख दरिया है' क्या मौला



जैसे पढ़ते हैं किताबों को

काश पढ़ते चेहरा मौला



शाख पर हम घर बनाते गर

हौसला होता जवाँ मौला



जेब खाली और मैं मुज़रिम

जिंदगी है गुमशुदा मौला



रात आधी और नींद नहीं

है उसी का सब किया मौला



है उसे कोई फ़िक्र ही कब

ख़्वाब देकर चल दिया मौला



मन अभी जो बादलों में था

वो ज़मी पे आ गिरा… Continue

Added by Pari M Shlok on July 9, 2015 at 3:05pm — 17 Comments

मैं तकती हूँ राह मगर क्यूँ शाम नहीं आता © परी ऍम. 'श्लोक'

२२ २२ २२ २२ २२ २२ २



उस हरजाई का कोई पैग़ाम नहीं आता

मैं तकती हूँ राह मगर क्यूँ शाम नहीं आता



करती है लाखों बातें आँखें उसकी मुझसे

जाने क्यूँ लब पे ही मेरा नाम नहीं आता



होगी कुछ सच्चाई तो कि धुआँ सा उठता है

यूँ ही तो सर पर कोई इल्ज़ाम नहीं आता



तुमसे उल्फ़त ने ही ये हाल किया है अपना

दिल की किस्मत में वरना शमशान नहीं आता



दूर खड़ा साहिल पर बेहिस तकता है मुझको

हो मुश्किल चाहे कुछ भी वो काम नहीं आता



ए इश्क़ तेरी… Continue

Added by Pari M Shlok on July 4, 2015 at 4:19pm — 24 Comments

तू वहाँ मशरूफ़ मैं यहाँ तन्हा

2 1 2 2 2 1 2 1 2 2 2

तू वहाँ मशरूफ़ मैं यहाँ तन्हा

ये ज़मी तनहा वो' आसमाँ तन्हा



अब तेरी यादें यहाँ मचलती हैं

रह गया टूटा हुआ मकाँ तन्हा



हमने हर मौसम के' रंग देखें हैं

हम कभी तन्हा कभी समाँ तन्हा



चल दिए अरमां जला के' तिनकें सा

देर तक उठता रहा धुआँ तन्हा



हैं पड़ी ज़ंज़ीर दिल के पैरों में

हम अगर जाएँ तो अब कहाँ तन्हा



सोच कर ये रूह काँप जाती है

दिल में बस्ती बसे मकाँ तन्हा



जब न बंधन हो न ही रस्म… Continue

Added by Pari M Shlok on July 2, 2015 at 9:05am — 20 Comments

वफ़ा ढूंढा करोगे लोगों में ( © परी ऍम. 'श्लोक' )

१ २ २ २ १ २ १ २ २ २
पुकारा तुम करोगे लोगों में
मुझे ना पा सकोगे लोगों में

चले जायेंगे जां तेरी लेकर
बने बुत से जियोगे लोगों में

कटेगा भी नहीं सफ़र तन्हा
बेहिस चलते रहोगे लोगों में

मेरे जाने के बाद मुद्दत तक
मेरा रास्ता तकोगे लोगों में

मिलेगी फिर नहीं कभी जानाँ
वफ़ा ढूंढा करोगे लोगों में

© परी ऍम. 'श्लोक'

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Pari M Shlok on July 1, 2015 at 12:16pm — 22 Comments

उनके बाहों की सौग़ात मिली

उनके बाहों की सौग़ात मिली
इक मुद्दत पे ऐसी रात मिली

जाने मेरे हक़ का था वो पल
या मुझको कोई खैरात मिली

रिमझिम रिमझिम मेरी आँखों से
उसकी याद लिए बरसात मिली

सोचा क्या था क्या पाया मैंने
टूटे सपनों की बारात मिली

जिनको सज़दे में माँगा ता-उम्र
उनसे कुछ पल कि मुलाक़ात मिली

जब सोचा की अब जीतेंगे हम
बस उस पल ही मुझको मात मिली

© परी ऍम. 'श्लोक'

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Pari M Shlok on June 18, 2015 at 5:13pm — 18 Comments

मैं एक हिंदुस्तानी औरत हूँ - परी ऍम. 'श्लोक'

आदमी क्या खूब कोशिश करते हैं

गम मिटाने के लिए...

ले कर जाम हाथों में अपने

रोज़ कहते हैं

कि वो टूटे हैं बिखरे हैं बेहाल बेहद हैं

रोज़ कहते हैं

करता हूँ नशा सबकुछ भूल जाने के लिए

फूंकता हूँ सिगरेट हर फ़िक्र धुंए में उड़ाने के लिए

सोचती हूँ कि

कितनी तरकीब हैं आदमी के पास

अपने आपको सुकून पहुँचाने के लिए

मगर

मेरे पास अपने दर्द में असीर रहने के सिवा

कोई राह राहत की नज़र नहीं आती

मैं ये शौक भी अता नहीं फरमा सकती

हाँ! मुझे अक्सर ये… Continue

Added by Pari M Shlok on February 24, 2015 at 11:07am — 19 Comments

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