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मैं तकती हूँ राह मगर क्यूँ शाम नहीं आता © परी ऍम. 'श्लोक'

२२ २२ २२ २२ २२ २२ २

उस हरजाई का कोई पैग़ाम नहीं आता
मैं तकती हूँ राह मगर क्यूँ शाम नहीं आता

करती है लाखों बातें आँखें उसकी मुझसे
जाने क्यूँ लब पे ही मेरा नाम नहीं आता

होगी कुछ सच्चाई तो कि धुआँ सा उठता है
यूँ ही तो सर पर कोई इल्ज़ाम नहीं आता

तुमसे उल्फ़त ने ही ये हाल किया है अपना
दिल की किस्मत में वरना शमशान नहीं आता

दूर खड़ा साहिल पर बेहिस तकता है मुझको
हो मुश्किल चाहे कुछ भी वो काम नहीं आता

ए इश्क़ तेरी बस्ती को कर ले गम से खाली
इन गलियो में भी दिल को आराम नहीं आता

कुछ दर्द जवां होकर तकलीफ़ बहुत देते हैं
यूँ ही तो हाथों में अपने ये जाम नहीं आता

© परी ऍम. 'श्लोक'
"मौलिक व अप्रकाशित"

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 13, 2015 at 11:48pm

आपका प्रयासरत रहना सुखद है आदरणीया परीजी.
मतले में शाम को श्याम कर लें तो बेहतर.
शुभेच्छाएँ

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 6, 2015 at 8:15pm

बहुत ही शानदार गजल लिखी है आपने आदरणीया परी जी !

Comment by Pari M Shlok on July 6, 2015 at 1:04pm
narendrasinh chauhan जी दिल से आभार
Comment by Pari M Shlok on July 6, 2015 at 1:02pm
Manoj kumar Ahsaas जी :) शुक्रिया
Comment by Pari M Shlok on July 6, 2015 at 12:59pm
वीनस केसरी जी बहुत-बहुत शुक्रिया
Comment by Pari M Shlok on July 6, 2015 at 12:58pm
शिज्जु "शकूर" जी आपका हार्दिक आभार
Comment by Pari M Shlok on July 6, 2015 at 12:31pm
सुनील प्रसाद(शाहाबादी) जी दिली शुक्रिया आदरणीय
Comment by Pari M Shlok on July 6, 2015 at 12:29pm
Dr. (Mrs) Niraj Sharma हार्दिक धन्यवाद आपका आदरणीय
Comment by Pari M Shlok on July 6, 2015 at 12:27pm
krishna mishra 'jaan'gorakhpuri जी आपका शुक्रिया बहुत बहुत
Comment by Pari M Shlok on July 6, 2015 at 12:24pm
vinaya kumar singh जी बहुत बहुत आभार आपका

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