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जब-जब ख़्वाब सुनहरे देखे - ग़ज़ल

सागर से भी गहरे देखे.

जब-जब ख़्वाब सुनहरे देखे.

 

नए दौर में नई सदी में,

साँसों पर भी पहरे देखे. 

 

गांधी जी के तीनों बंदर, 

अंधे गूँगे बहरे देखे.

 

अंदर कुछ थे बाहर से कुछ,

हमने जितने चेहरे देखे.

 

कुछ आँसू मरते आँखों में,

कुछ पलकों पर ठहरे देखे. 

 

नीड़ बनाते देखे पंछी,

पढ़ते नहीं ककहरे देखे

 

नीचे नंगी भूख बिलखती,

ऊपर झंडे फहरे देखे.

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Deepalee Thakur on October 14, 2020 at 4:16pm
वाह! बहुत बढ़िया ग़ज़ल बहुत बहुत बधाई सुंदर रचना के लिए।

कृपया ध्यान दे...

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