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कच्ची कलियाँ क्यों मरती - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२२२/२२२२/२२२२


काँटा चुभता अगर पाँव को धीरे धीरे
आ जाते हम  यार  ठाँव को धीरे धीरे।१।
*
कच्ची कलियाँ क्यों मरती बिन पानी यूँ
सूरज छलता  अगर  छाँव को धीरे धीरे।२।
*
खेती बाड़ी सिर्फ कहावत होगी क्या
निगल रहा है नगर गाँव को धीरे धीरे।३।
*
कौन दवाई ठीक करेगी बोलो राजन
पेट देश के लगी  आँव को धीरे धीरे।४।
*
जीत कठिन भी हो जाती है सरल उन्हें
जो चलते हैं  सोच  दाँव  को धीरे धीरे।५।
*
कोयल सा ही शायद वो भी प्यारा हो
कौवा बोले अगर काँव को धीरे धीरे।६।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 19, 2021 at 4:56pm

आ. भाई बृजेश कुमार जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व  केे लिए  हार्दिक धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 19, 2021 at 4:54pm

आ. भाई समर जी सादर अभिवादन । गजल पर पुनः उपस्थिति व छूटी गलतियों को बताने के लिए आभार ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 18, 2021 at 10:09pm

अहा...क्या कहने आदरणीय बेहद खूबसूरत...हर शे'र एक से बढ़कर एक..बधाई

काँटा चुभता अगर पाँव को धीरे धीरे
आ जाते हम  यार  ठाँव को धीरे धीरे। वाह वाह

Comment by Samar kabeer on February 18, 2021 at 7:27pm

'कच्ची कलियाँ क्यों मरती बिन पानी यूँ'

इस मिसरे में 'मरती' को "मरतीं'' कर लें ।

'कौन दवाई ठीक करेगी बोलो राजन'

इस मिसरे में 1 फ़ा अधिक है,देखें ।

बाक़ी सुधार ठीक हैं ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 16, 2021 at 9:06pm

आ. भाई समर जी, बदलाव किया है , देखिएगा

२२२२/२२२२/२२२
काँटा चुभता यदि पाँव को धीरे धीरे
हम आ ही जाते  ठाँव को धीरे धीरे।१।
*
कच्ची कलियाँ क्यों मरती बिन पानी यूँ
सूरज छलता  यदि  छाँव को धीरे धीरे।२।
*
खेती बाड़ी सिर्फ कहावत होगी क्या
निगले नित्य नगर गाँव को धीरे धीरे।३।
*
कौन दवाई ठीक करेगी बोलो राजन
देश के पेट लगी आँव को धीरे धीरे।४।
*
जीत कठिन भी हो जाती है सरल उन्हें
जो सोच के चलते  दाँव  को धीरे धीरे।५।
*
कोयल सा ही शायद वो भी प्यारा हो
कौवा बोले यदि  काँव  को धीरे धीरे।६।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 16, 2021 at 5:54am

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व मार्गदर्शन के लिए आभार । सुधार का प्रयास कर पुनः उपस्थित होता हूँ। सादर.

Comment by Samar kabeer on February 15, 2021 at 6:13pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'काँटा चुभता अगर पाँव को धीरे धीरे'

इस मिसरे में पहली बात ये कि 'को' की जगह "में'' शब्द की ज़रूरत है, दूसरी बात ये कि काँटा चुभता धीरे धीरे तार्किकता की दृष्टि से ठीक नहीं लगता, ग़ौर करें ।

'कच्ची कलियाँ क्यों मरती बिन पानी यूँ
सूरज छलता  अगर  छाँव को धीरे धीरे'

इस शैर के ऊला में 5 फ़ेलुन 1 फ़ा यानी एक 2 कम है,सानी मिसरे की तक़ती'अ कर के बताने का कष्ट करें ।

'खेती बाड़ी सिर्फ कहावत होगी क्या
निगल रहा है नगर गाँव को धीरे धीरे'

इस शैर के ऊला में भी एक 2 कम है,और सानी की तक़ती'अ कैसे होगी?  बताने का कष्ट करें ।

'पेट देश के लगी  आँव को धीरे धीरे'

इस मिसरे की तक़ती'अ कैसे होगी? बताने का कष्ट करें ।

'जीत कठिन भी हो जाती है सरल उन्हें
जो चलते हैं  सोच  दाँव  को धीरे धीरे'

इस मिसरे के ऊला में भी एक 2 कम है,और सानी की तक़ती'अ कैसे होगी? बताने का कष्ट करें ।

'कोयल सा ही शायद वो भी प्यारा हो
कौवा बोले अगर काँव को धीरे धीरे'

इस शैर के ऊला में भी एक 2 कम है,सानी की तक़ती'अ कैसे होगी? बताने का कष्ट करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 15, 2021 at 9:10am

आ. भाई आज़ी तमाम जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए आभार।

Comment by Aazi Tamaam on February 15, 2021 at 2:49am

बेहद ही मधुर लयबद्ध किया है शुक्रिया मुसाफिर जी

अच्छी रचना है

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