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इस बार भी करेंगे ये सौदा किसान का -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२


पहने हुए हैं जो भी मुखौटा किसान का
हित चाहते नहीं हैं वो थोड़ा किसान का।१।
*
बन के हितेशी नित्य हित अपना साधते
बाधित करेंगे ये ही तो रस्ता किसान का।२।
*
नीयत है इनकी खोटी ये करने चले हैं बस
दस्तार अपने हित में दरीचा किसान का।३।
*
होती इन्हें तो भूख है अवसर की नित्य ही
चाहेंगे पाना खून पसीना किसान का।४।
*
स्वाधीन हो के देश में किस ने उठाया है
रुतबा किया सभी ने है नीचा किसान का।५।
*
सब के टिकी हुई है ये कुर्सी निगाह में
इस बार भी करेंगे ये सौदा किसान का।६।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 11, 2021 at 2:16pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 11, 2021 at 2:14pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व स्नेह के लिए आभार ।

Comment by TEJ VEER SINGH on February 11, 2021 at 12:16pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी। बेहतरीन गज़ल।

सब के टिकी हुई है ये कुर्सी निगाह में
इस बार भी करेंगे ये सौदा किसान का।६

Comment by Sushil Sarna on February 10, 2021 at 8:33pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी वर्तमान को जीवंत करती बेहतरीन ग़ज़ल। हार्दिक बधाई स्वीकार करें सर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 9, 2021 at 9:13pm

"आ. भाई नाथ सोनांचली जी, अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 9, 2021 at 9:12pm

आ. भाई समर जी, पुनः उपस्थिति व स्नेह के लिए आभार...

Comment by Samar kabeer on February 9, 2021 at 7:00pm

'बन के हितेशी लाभ जो अपना हैंं साधते'

अब ठीक है ।

Comment by नाथ सोनांचली on February 9, 2021 at 6:53pm

आद0 लक्ष्मण धामी जी 'मुसाफ़िर' जी सादर अभिवादन। अच्छी ग़ज़ल हुई है,  शेष आद0 समर साहब ने कह दिया है। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 9, 2021 at 6:33pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति, सलाह व उत्साहवर्धन के लिए आभार..

इंगित मिसरे को यूँ देखियेगा

."बन के हितेशी लाभ जो अपना हैंं साधते'

Comment by Samar kabeer on February 9, 2021 at 6:08pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'बन के हितेशी नित्य हित अपना साधते'

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