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हम तो हल के दास ओ राजा-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२/२२/२२/२२


हम तो हल के दास ओ राजा
कम देखें  मधुमास  ओ राजा।१।
*
रक्त  को  हम  हैं  स्वेद  बनाते
क्या तुमको आभास ओ राजा।२।
*
अन्न तुम्हारे पेट में भरकर
खाते हैं सल्फास ओ राजा।३।
*
पीता  हर  उम्मीद  हमारी
कैसी तेरी प्यास ओ राजा।४।
*
हम से दूरी  मत  रख इतनी
आजा थोड़ा पास ओ राजा।५।
*
खेती - बाड़ी  सब  सूखेगी
जो तोड़ेगा आस ओ राजा।६।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 13, 2021 at 5:40pm

आ. भाई विजय निकोर जी , सादर अभिवादन। आपकी मनभावन उपस्गथिति से लेखन सफल हुइ। गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 13, 2021 at 5:38pm

आ. रचना बहन , सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार।

Comment by vijay nikore on February 13, 2021 at 4:54pm

प्रिय मित्र लक्ष्मण जी, गज़ल अच्छी लगी। बधाई।

Comment by Rachna Bhatia on February 13, 2021 at 10:49am

आदरणीय लक्ष्मण धामी'मुसाफ़िर'जी नमस्कार। शानदार ग़ज़ल हुई बधाई स्वीकार करें।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 12, 2021 at 7:01pm

आ. भाई क्रिस मिश्रा जी, गजल पर उपस्थिति व मनभावन टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 11, 2021 at 9:11pm

वाह! अद्भुत ग़ज़ल हुई है बेहतरीन, लाज़वाब।बहुत बहुत बधाई बड़े भैया।

इस ग़ज़ल की सबसे प्यारी बात मुझे ये लगी कि... ऐसा लगता है जैसे स्वत: अंतर्मन के भाव फूट पड़ें हो, कोई भी ऊपरी बनावट नहीं की गई है।पुनः बधाई और शुभकामनाएं बड़े भैया।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 9, 2021 at 9:10pm

आ. भाई समर जी, पुनः उपस्थिति व स्नेह के लिए आभार...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 9, 2021 at 9:08pm

आ. भाई समर जी, पुनः उपस्थिति व स्नेह के लिए आभार...

Comment by Samar kabeer on February 9, 2021 at 6:58pm

'अन्न जगत के पेट में भरकर'

ये मिसरा ठीक है ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 9, 2021 at 6:25pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति, सलाह व उत्साहवर्धन के लिए आभार..

 "अन्न जगत के पेट में भरकर' या अन्न सभी के लिए उगाकर/यह मिसरा ठीक रहेगा क्या, सुझाईएगा.

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