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ये लहर ऐसे न साथी साथ देगी अब यहाँ -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२


हर लहर से बढ़ के अब तो रार साथी तेज कर
पार  जाने  के  लिए  पतवार  साथी  तेज  कर।१।
*
ये  लहर  ऐसे  न  साथी  साथ  देगी  अब  यहाँ
झील के  पानी  में  थोड़ी  मार  साथी तेज कर।२।
*
जुल्म  के  पत्थर  इसी  से  कट  गिरेंगे  देखना
पहले पत्थर पर कलम की धार साथी तेज कर।३।
*
काट दी है जीभ इन की चीखना सम्भव नहीं
सच कहेंगी  बेड़ियाँ  झन्कार  साथी  तेज कर।४।
*
ये तो  पीड़ित  हैं  इन्हें  कैसे  भरोसा  आयेगा
साथ लाने के  लिए  उपकार  साथी तेज कर।५।

*

जुल्म के महलों को करना राख हमने ही तो है
अब दिलों  में जल रहे  अंगार  साथी तेज कर।६।
*
खाल  ओढ़े  शेर  की  नित  घूमते  ये  भेड़िये
आ सकें पहचान  में  ललकार साथी तेज कर।७।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 12, 2021 at 6:57pm

आ. भाई क्रिस मिश्रा जी, गजल पर उपस्थिति व स्नेह के लिए आभार।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 12, 2021 at 5:53pm

बहुत ख़ूब गजल हुई आ. लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर भैया हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 12, 2021 at 2:39pm

आ. भाई आज़ी तमाम जी, गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by Aazi Tamaam on February 11, 2021 at 11:31pm

आ० मुसाफिर जी हर इक शैर दिल में उतरता है ग़ज़ल लाजवाब है

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 9, 2021 at 9:06pm

आ. भाई नाथ सोनांचली जी, अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by नाथ सोनांचली on February 9, 2021 at 6:51pm

आद0 लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी सादर अभिवादन। 

अच्छी ग़ज़ल कही है, बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 9, 2021 at 6:17pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति व उत्साहवर्धन के लिए आभार..

Comment by Samar kabeer on February 9, 2021 at 5:47pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 4, 2021 at 8:49pm

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार । 

Comment by सालिक गणवीर on February 4, 2021 at 7:44pm

आदरणीय भाई  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी
सादर अभिवादन
भाई वाह। एक और सामाजिक सरोकार से भरपूर उम्दः ग़ज़ल के लिए बधाइयाँ स्वीकार करें.

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