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मानता हूँ तम गहन सरकार लेकिन-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२


किसलिए भण्डार अपने भर रहे हो
देश बेबस को  निवाला  कर रहे हो।१।
*
रंग पोते धर्म  का  बाहर से अपने
आप केवल पाप के ही घर रहे हो।२।
*
निर्वसनता  चन्द  लोगों  को सुहाती
इसलिए क्या चीर सब का हर रहे हो।३।
*
कत्ल का आदेश तुमने ही दिया जब
खून के छींटों से क्योंकर  डर रहे हो।४।
*
व्यर्थ है  उम्मीद  पिघलोगे  कभी ये
है पता  हर  जन्म  में  पत्थर रहे हो।५।
*
मानता हूँ तम गहन सरकार लेकिन
क्यों चिताओं से उजाला कर रहे हो।६।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 11, 2021 at 11:56am

आ. भाई विजय निकोर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति , स्नेह व उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by vijay nikore on May 11, 2021 at 6:17am

सामयिक स्थिति इंगित करती यह गज़ल अच्छी बनी है, भाई लक्ष्मण जी। हार्दिक बधाई।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 7, 2021 at 7:04pm

आ. भाई विजय शंकर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by Dr. Vijai Shanker on May 7, 2021 at 9:08am

आदरणीय लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी , अत्यंत मार्मिक , सामयिक प्रस्तुति के लिए अनेकानेक बधाइयां , सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 29, 2021 at 12:31pm

आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व मनभावन प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 29, 2021 at 10:12am

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार 

अत्यंत मार्मिक गज़ल हुई है, बधाई स्वीकारें 

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