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पिता को समर्पित महाभुजंगप्रयात छन्द

1।।

कभी डाँट से तो कभी स्नेह दे के पिता ने किया  पूर्ण  कल्यान मेरा
पढ़ाया लिखाया सिखाया मुझे जो उसी से हुआ आज  उत्थान मेरा
नहीं  जो पिता साथ होते कभी तो, लगा यों कि  संसार  वीरान मेरा
पिता का नहीं नाम जो साथ होता न होता  कही आज सम्मान मेरा

2।।

पिता में  बसे  तीर्थ  सारे  हमारे  उन्हीं  में  सदा  ईश  का  भान  पाया
पिता के  बिना जो  पड़ी  मुश्किलें तो स्वयं को निरामूर्ख नादान पाया
निजी  ज़िन्दगी  में पिता जी  सरीखा रहा दोस्त जो वो न इंसान पाया
पिता चीज़ क्या है, बना मैं पिता तो, पिता की महत्ता तभी जान पाया

नाथ सोनांचली

विधान: यमाता × 8 अर्थात

122 122 122 122 122 122 122 122

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by नाथ सोनांचली on June 22, 2022 at 8:34pm

आद0 लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी सादर अभिवादन।

रचना पर आपकी उपस्थिति और आत्मिक प्रतिक्रिया का हृदयतल से आभार

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 22, 2022 at 6:27pm

आ. भाई नाथ सोनांचली जी, सादर अभिवादन। सुन्दर छन्द हुए हैं । हार्दिक बधाई।

Comment by नाथ सोनांचली on June 17, 2022 at 12:48pm

आद0 चेतन प्रकाश जी सादर अभिवादन। आपकी रचना पर उपस्थिति और आत्मिक प्रतिक्रिया से आह्लादित हूँ। आभार आपका

Comment by Chetan Prakash on June 17, 2022 at 12:35pm

नमस्कार, भाई, नाथ सोनांचली, बेहद सार्थक, सटीक भावों से ओत- प्रोत महाभुजंग प्रयात छंद लिखे, आपने । एतद्वारा आपको बधाई प्रेषित करता हूँ । आपके पिता, दीर्घायु हों !

Comment by नाथ सोनांचली on June 15, 2022 at 7:47am

आद0 समर कबीर साहब सादर प्रणाम। रचना को पोस्ट करने के बाद आपकी उपस्थिति का मुझे सदैव इतंजार रहता है। आपकी टिप्पणी मेरे लिए आशीष है। हृदयतल से आभार आपका।

Comment by Samar kabeer on June 15, 2022 at 7:36am

जनाब नाथ सोनांच्ली जी आदाब, पिता को समर्पित अच्छे छंद लिखे आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें I 

Comment by नाथ सोनांचली on June 13, 2022 at 10:46am

आद0 चेतन प्रकाश जी सादर अभिवादन। सुधार कर दिया हूँ। हृदयतल से आभार आपका

Comment by Chetan Prakash on June 11, 2022 at 5:06pm

अच्छा प्रयास किया, बंधुवर,  बधाई  ! किन्तु तीसरे पद को देखिए,  यमाता की लय भंग  हो रही है!

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