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पड़ते दुख के घाट पर, कभी न जिनके पाँव
समझ न आता  है  उन्हें, जग  में रोता गाँव।१।
*
चल आती है जो खुशी, दुख बैठा जिस राह
पुरखों से सुनते  वही, टिकती  बहुत अथाह।२।
*
सुख से सुख की कब हुई, तुलना जग में बोल
सुख का करते मान  हैं, बजकर दुख के ढोल।३।
*
दुख आकर देता सदा, सुख को रंग हाजार
उस बिन फीका ही रहे, सुख का घर संसार।४।
*
दुख तो ऐसा बौर है, जिस भीतर सुख बीच
जोर-जबर से कब  इसे, कोई  सका उलीच।५।
*
बिन दुख तो बेकार है, मन में सुख की चाह
नित लेते हैं सन्तजन, दुख से सुख की थाह।६।
*
कुछ कहते दुख धूप है, कुछ कहते सुख धूप
सन्तों  को   पर   एक  से, दोनों   रहे  अरूप।७।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by Samar kabeer on August 1, 2024 at 6:00pm

जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब, दोहों का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें,शेष जनाब अशोक रक्ताले जी कह चुके हैं ।

'चल आती है जो खुशी'

इसे भी देख लें ।

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 1, 2024 at 5:16pm

  आदरणीय भाई लक्षमण धामी जी सादर, सुख और दुःख को आधार बनाकर सुन्दर दोहावली रची है आपने. हार्दिक बधाई स्वीकारें. किन्तु दोहों के भावों में स्पष्टता नहीं होने से पाठक असमंजस में रह जाता है.

पड़ते दुख के घाट पर, कभी न जिनके पाँव...........यहाँ तक स्पष्ट है.
समझ न आता  है  उन्हें, जग  में रोता गाँव।१।........... जग में गाँव के रोने का भाव इस दोहे के पूर्व चरण तक आये भावों से सीधे सम्बन्ध नहीं बना पा रहा है. इसे / क्यों गुमसुम है गाँव/ क्यों सूना है गाँव/ कुछ इस तरह किया जाए तो बेहतर होगा.

दुख आकर देता सदा, सुख को रंग हाजार/हज़ार...........दुःख आकर सुख को रंग देता है कुछ उल्टा ही भाव प्रतीत होता है. क्योंकि दुःख 
उस बिन फीका ही रहे, सुख का घर संसार।४।               रंग छीनने का काम करता है.

'उलीच'...शब्द का प्रयोग प्रायः तरल पदार्थ के लिए किया जाता है. बौर के बीच तरल का संगृहीत होना सम्भव नहीं जान पड़ता है. सादर 

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