विरह तुम्हारा सह न पाऊं, कैसे मै मन को समझाऊ
तुमसे ही मै जीवन पाऊं, तुमबिन न स्वागत कर पाऊं
बिछे ह्रदय में पलक-पाँवड़े,मेंह बाबा मै तुम्हे रिझाऊं
ताल तलैया जग के सूखे,स्वर्ग लोक से तुम्हे बुलाऊं |
कमी रही क्या स्वागत में, जो तुम इतने रूठ रहे हो
कहर ढा दिया उत्तरा-खंड में,ऐसे निष्ठुर बन बैठे हो ?
जलबिन तड़फे जग के प्राणी, बोलो उनको कौन बचाए
बरसो धूम धडाके से अब, स्वागत को सब आतुर पाए |
मना मना का थक बैठे अब, क्या खता जो सजा दिलाए
तुम बरसो तो ठंडक पाए, वरना प्रचण्ड धूप से जल जाए
स्वर्गलोक के राजा तुम तो,जग को भी तुमसे ही आशाए
बरसो अब तो जल्दी आकर, स्वागत करे अगर आ जाएं |
(स्वरचित व अप्रकाशित)
Comment
आपकी टिपण्णी से सदैव ही उत्साह बढ़ता है | आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय श्री सौरभ भाई जी
आपकी टिपण्णी से रचना से खुबसूरत होने का अहसास कराने के लिए आपका हार्दिक आभार भाई विशाल चर्चित जी
मेंह बाबा की प्रतीक्षा मनोहारी है.. आदरणीय .. :-)))
रचना पसंद करने के लिए आपका बहुत बहुत आभार श्री विजय निकोरे जी
जी आदरणीया राजेश कुमारी जी, प्रार्थना में विश्वास निहित होता है तो सुनवाई की आशा भी | रचना सराहने के लिए आपका
हार्दिक आभार
रचना पसंद करने के लिए आपका आभार श्री (डॉ) आशुतोष मिश्रा जी
विकराल गर्मी पर पुरवाई सा एह्सास देती खूबसूरत रचना !!!
रचना के भाव अच्छे लगे। आपको बधाई , आदरणीय।
मेह बाबा की स्तुति बहुत सुन्दर लगी ,थोड़े दिन में जरूर सुनेंगे हम भी प्रार्थना कर रहे हैं .बहुत- बहुत बधाई आ० लक्ष्मण जी.
बहुत समय बाद आपकी सुझाव सहित टिपण्णी पढ़कर ख़ुशी हुई | प्रयास रत रहूंगा | हार्दिक आभार डॉ प्राची बहिन जी
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