For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

तुम्हारे स्पर्श से....

मैं संग चल दी उनके,
मेरा मन यहीं रह गया...
उन्होंने दिखाये होंगे हजारों ख्वाब,
पर इन आँखों में रौशनी कहाँ थी !!

कितने ही गीत सुनाये होंगे उन्होंने,
पर इन कानों के पट तो बंद हो चुके थे !!

उनके सबालों का,
जबाब भी ना दे पायी थी मैं....
क्योंकी इन होठों पे, तुम्हारा ही नाम रखा था!!

कितना आक्रोश था उनके ह्रदय में,
जब उन्होंने,
मेरे केशों को पकड़कर खींचा था...

और मैं पत्थर सी हो गयी थी,
किसी भी आघात की पीड़ा ना हुई मुझे!!

ऐसी बेजान चीज को-
कौन...रखता अपने पास?

वो मुझे वहीं छोड़ गये,
जहाँ से उठा ले गये थे...

इन आँखों में अब रौशनी आ गयी है,
कानों के पट भी खुल चुके हैं....
जीवित हो गयीं हूँ मैं,
तुम्हारे स्पर्श स्पर्श से !!
(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 731

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by रक्षिता सिंह on June 19, 2018 at 10:42pm

आदरणीय तस्दीक़ जी नमस्कार

,रचना पर आपकी शिर्कत के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on June 19, 2018 at 7:02pm

मुह तरमा रक्षीता साहिबा, अच्छी रचना हुई है मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं |

Comment by रक्षिता सिंह on June 19, 2018 at 2:26pm

आदरणीय विजय जी नमस्कार,

रचना पसंद  के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ।।

Comment by vijay nikore on June 19, 2018 at 9:01am

आपकी कविता अच्छी लगी।हार्दिक बधाई।

Comment by रक्षिता सिंह on June 17, 2018 at 11:09pm

आदरणीय कबीर जी नमस्कार, आपकी शिर्कत के लिए बेहद शुक्रिया...., आपको कविता पसंद  आयी ...लिखना सार्थक हुआ।

आपके द्वारा बताई त्रुटि को मैं शीघ्र ही सुधारने का प्रयास करूँगी, कृपया इसी तरह मार्गदर्शन करते रहें बहुत बहुत  धन्यवाद !!

Comment by Samar kabeer on June 17, 2018 at 12:11pm

मोहतरमा रक्षिता सिंह जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

सातवीं पंक्ति में 'सबालों' को "सवालों" कर लें ।

Comment by रक्षिता सिंह on June 16, 2018 at 9:49pm

आदरणीय नरेन्द्र जी एवं आदरणीया नीलम जी नमस्कार, आपकी उपस्थिति व रचना की सराहना के लिए बहुत बहुत शुक्रिया ....

Comment by Neelam Upadhyaya on June 16, 2018 at 6:27pm

आदरणीय रक्षिता सिंह जी, नमस्कार। सुन्दर रचना की प्रस्तुति के ली बढ़ायी स्वीकार करें। 

Comment by narendrasinh chauhan on June 16, 2018 at 9:02am
खुब सुन्दर रचना...
Comment by रक्षिता सिंह on June 15, 2018 at 10:04pm

आदरणीय मोहित जी नमस्कार,

रचना पर आपकी उपस्थिति के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . प्यार

दोहा सप्तक. . . . प्यारप्यार, प्यार से माँगता, केवल निश्छल प्यार ।आपस का विश्वास ही, इसका है आधार…See More
6 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, उत्साहवर्धन व स्नेह के लिए आभार।"
yesterday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ.लक्ष्मणसिह धानी, 'मुसाफिर' साहब  खूबसूरत विषयान्तर ग़ज़ल हुई  ! हार्दिक …"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर मुक्तक हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।"
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"ग़ज़ल   बह्र ए मीर लगता था दिन रात सुनेगा सब के दिल की बात सुनेगा अपने जैसा लगता था…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'

बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में आये कमी कहाँ  से  कहो  फिर दुराव में।१। * अवसर समानता का कहे…See More
Saturday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
" दोहा मुक्तक :  हिम्मत यदि करके कहूँ, उनसे दिल की बात  कि आज चौदह फरवरी, करो प्यार…"
Saturday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"दोहा एकादश. . . . . दिल दिल से दिल की कीजिये, दिल वाली वो बात । बीत न जाए व्यर्थ के, संवादों में…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"गजल*****करता है कौन दिल से भला दिल की बात अबबनती कहाँ है दिल की दवा दिल की बात अब।१।*इक दौर वो…"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service