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जुबां से फूल झड़ते हैं मगर पत्थर उछालें वे
गजब दिलदार हैं, महबूब हैं बस खार पालें वे।1

लगाते आग पानी में, हमेशा ही लगे रहते
बुझे क्यूँ रार की बाती, नई तीली निकालें वे।2

दिलों की आग जब उठकर दिलों को यूँ बुलाती है
करेंगे और क्या बस शीत जल हर बार डालें वे।3

समझना हो गया मुश्किल चलन अब के रफ़ीकों का
सियाही लिख नहीं सकती है' कितना रोज सालें वे।4

हकीकत फासलों में कैद होकर छटपटाती है
सुनेंगे तो नहीं कुछ गाल जितना भी बजालें वे।5
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Manan Kumar singh on September 21, 2019 at 1:56pm

आभार आदरणीय।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 21, 2019 at 12:28pm

वाह बढ़िया ग़ज़ल कही है आदरणीय..

Comment by Manan Kumar singh on September 20, 2019 at 10:00am

आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय बसंत शर्मा जी।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 19, 2019 at 9:45pm
आदरणीय मनन कुमार सिंह जी सादर नमस्कार
बधाई हो आपको बढ़िया ग़ज़ल की
Comment by Manan Kumar singh on September 19, 2019 at 8:03pm

जी जनाब समर जी,नमस्ते।आपका बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Samar kabeer on September 19, 2019 at 2:31pm

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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