For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल: वक़्त की शतरंज पर किस्मत का एक मोहरा हूँ मैं।

2122 2122 2122 212
.
वक़्त की शतरंज पर किस्मत का एक मोहरा हूँ मैं। 
ज़िंदगी इतना भी ख़ुश मत हो, अभी ज़िंदा हूँ मैं। 
.
मैं ख़ुदा की हाज़िरी में भी न बदलूँगा बयान, 
तुझको हाज़िर और नाज़िर जानकार कहता हूँ मैं। 
.
एक ही घर में बसर करना मुहब्बत तो नहीं, 
आज भी तेरी ख़ुशी और ग़म से वाबस्ता हूँ मैं। 
.
मेरी हर एक बात के मतलब हैं सौ, मक़सद हज़ार,
झूठ भी सच की मीनारों से कहा करता हूँ मैं। 
.
ऐ मेरे मालिक! ये तेरा अक्स मैला हो गया, 
अब भी लगता है तुझे तेरा नुमाइंदा हूँ मैं? 
.
ये मुहब्बत है तुम्हारी और तो कुछ भी नहीं, 
शायरों की भीड़ में अब तक पसंदीदा हूँ मैं। 
.
उपनिषद, क़ुर्आन दोनों ठीक लगते हैं मुझे, 
और उन्हें लगता है उनकी कौम को ख़तरा हूँ मैं। 
.
जिसमें बह जाते हैं इकदिन मीर भी, मंसूर भी, 
बस उसी बहते हुए दरिया का एक क़तरा हूँ मैं। 
.
तुमने जिसको तोड़कर बाज़ार जैसा कर दिया, 
ये समझ लीजे, उसी मंदिर का कुछ मलबा हूँ मैं। 
.
ये मेरा लहजा, मेरा लहजा नहीं है दोस्तो, 
मेरा मुझमें कुछ नहीं है, सिर्फ़ आईना हूँ मैं। 
.
मुश्क़िलों की आँच ने आसान काफी कर दिया,
आज भी लेकिन मुझे लगता है पेचीदा हूँ मैं। 
.
कुछ अधूरी हसरतों का हैरत अंगेज़ अक्स हूँ, 
और कुछ टूटे हुए ख़्वाबों का आमेज़ा हूँ मैं। 
.
मौलिक/अप्रकाशित, 
बलराम धाकड़ । 

Views: 1192

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Balram Dhakar on September 19, 2023 at 4:29pm

बहुत बहुत शुक्रिया, आदरणीय नासवा जी.

सादर.

Comment by दिगंबर नासवा on November 21, 2019 at 9:54am

वाह ... धाकड़ है आपकी ग़ज़ल धाकड़ जी ...

हर शेर जैसे धड़कता हुआ दिल ... जिंदाबाद ... जिंदाबाद ...

Comment by Balram Dhakar on October 20, 2019 at 12:40am

आदरणीय दंडपाणि जी, 

आपको ग़ज़ल पसंद आई, मेरा लिखना सार्थक हुआ। 

बहुत बहुत शुक्रिया। 

सादर। 

Comment by Balram Dhakar on October 20, 2019 at 12:21am

आदरणीय प्रशांत भाई, 

बहुत बहुत धन्यवाद। 

सादर। 

Comment by प्रशांत दीक्षित 'प्रशांत' on October 18, 2019 at 7:44am

Bahut sundar sir

Comment by Balram Dhakar on October 17, 2019 at 10:21pm

आदरणीय समर सर, सादर अभिवादन। 

ग़ज़ल पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा थी।  

टंकण त्रुटियाँ सुधार कर ली जाएंगीं। 

जिस शेर के उला और सानी में रब्त नहीं है उसपर और कोशिश करता हूँ। 

आपकी हौसला अफ़ज़ाई ग़ज़ल का उचित पारितोषिक है। और बेहतर की दिशा में अग्रसर करती है। 

सादर। 

Comment by Samar kabeer on October 17, 2019 at 12:10pm

जनाब बलराम धाकड़ जी आदाब,बहुत उम्द: ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

'वक़्त की शतरंज पर किस्मत का एक मोहरा हूँ मैं'

इस मिसरे में 'एक' को "इक" और 'मोहरा' को "मुहरा" कर लें ।

'मेरी हर एक बात के मतलब हैं सौ, मक़सद हज़ार'

इस मिसरे में 'एक' को "इक'' कर लें ।

'झूठ भी सच की मीनारों से कहा करता हूँ मैं'

इस मिसरे में 'मीनारों' को "मिनारों" कर लें । 

'ऐ मेरे मालिक! ये तेरा अक्स मैला हो गया, 
अब भी लगता है तुझे तेरा नुमाइंदा हूँ मैं'
इस शैर के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,देखियेगा ।
'शायरों की भीड़ में अब तक पसंदीदा हूँ मैं'
इस मिसरे में 'शायरों' कोई शब्द नहीं है,इसे "शाइरों" लिखा करें ।
'बस उसी बहते हुए दरिया का एक क़तरा हूँ मैं'
इस मिसरे में 'एक' को "इक" कर लें ।
Comment by Balram Dhakar on October 17, 2019 at 12:07pm

हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया, आदरणीय लक्ष्मण जी। 

सादर। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 17, 2019 at 9:53am

आ. भाई बलराम जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश   . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के…See More
11 hours ago
Admin posted discussions
yesterday
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175

 आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey posted a blog post

नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ

   जिस-जिस की सामर्थ्य रही है धौंस उसी की एक सदा से  एक कहावत रही चलन में भैंस उसीकी जिसकी लाठी…See More
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आपने कहे को सस्वर किया इस हेतु धन्यवाद, आदरणीय  //*फिर को क्यों करने से "क्यों "…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना को आपने अनुमोदित कर मेरा उत्साहवर्धन किया, आदरणीय विजत निकोर जी हार्दिक आभार .. "
yesterday
Sushil Sarna commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"आदरणीय जी सादर प्रणाम -  अद्भुत सृजन - हृदय तटों को छूती गहन भावों की अभिव्यक्ति ने अहसासों की…"
yesterday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"प्रिय अशोक कुमार जी,रचना को मान देने के लिए हार्दिक आभार। -- विजय"
Monday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सौरभ जी। आपने सही कहा.. मेरा यहाँ आना कठिन हो गया था।       …"
Monday
vijay nikore commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"प्रिय सौरभ भाई, नमस्ते।आपका यह नवगीत अनोल्हा है। कई बार पढ़ा, निहित भावना को मन में गहरे उतारा।…"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service