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122 122 122 122

न जाने किधर जा रही ये डगर है ।

सुना है मुहब्बत का लम्बा सफर है ।।

मेरी चाहतों का हुआ ये असर है ।

झुकी बाद मुद्दत के उनकी नज़र है ।।

नहीं यूँ ही दीवाने आए हरम तक ।

इशारा तेरा भी हुआ मुख़्तसर है ।।

यहाँ राजे दिल मत सुनाओ किसी को ।

ज़माना कहाँ रह गया मोतबर है ।।

है साहिल से मिलने का उसका इरादा ।

उठी जो समंदर में ऊंची लहर है ।।

है मकतल सा मंजर हटा जब से चिलमन ।

बड़ी क़ातिलाना तुम्हारी नज़र है ।।

बतातीं हैं बिस्तर की ये सिलवटें अब ।

तुम्हें नींद आती नहीं रात भर है ।।

वहीं बैठती है वो रंगीन तितली ।

गुलों के लबों पर तबस्सुम जिधर है ।।

सुना हुस्न वालों के ख़ामोश लब हैं ।

लिपिस्टिक की रंगत का जाने का डर है ।।

ये कोशिश है मेरी उसे भूल जाऊं ।

मगर याद आता वो शामो सहर है ।।

तमन्ना थी जिसको बसा लूं मैं दिल मे ।

मेरी आरजू से वही बेख़बर है ।।

मुलाक़ात जाइज कहेगी ये दुनिया ।

तेरे ही गली से मेरा रहगुज़र है ।।

- नवीन मणि त्रिपाठी

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Comment

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Comment by दिगंबर नासवा on November 21, 2019 at 9:49am

एक अच्छा प्रयास है आपका ... मेरी बहुत बधाई ...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 20, 2019 at 4:29am

आ. भाई शवीन जी, गजल का अच्छा प्रयास हुआ है । हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on November 16, 2019 at 3:02pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, तरही ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'नहीं यूँ ही दीवाने आए हरम तक ।

इशारा तेरा भी हुआ मुख़्तसर है'

भाव की दृष्टि से इस शैर के सानी मिसरे में 'भी' शब्द भर्ती का है,और क़ाफ़िया भी उचित नहीं है ।

'है मकतल सा मंजर हटा जब से चिलमन'

इस मिसरे में 'चिल्मन' शब्द स्त्रीलिंग है ।

'मुलाक़ात जाइज कहेगी ये दुनिया ।

तेरे ही गली से मेरा रहगुज़र है'

इस शैर के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,दूसरी बात ये कि 'रहगुज़र' शब्द स्त्रीलिंग है,देखियेगा ।

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