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छोड़ दो काफ़ी सियासत हो गयी है

2122 2122 2122

.

जानते हैं तुम में ताकत हो गयी है,
और किस-किस पे ये आफत हो गयी है।

झूठ है जो, झूठ बिन कुछ भी नहीं, पर
अब जमाने में सदाक़त हो गयी है।

जब चमन का फूल होने का भरो दम,
क्यों चमन से ही अदावत हो गयी है?

जिस्म पर ठंडा लबादा, आग मुँह में,
जिसने रक्खे उसकी शुहरत हो गयी है।

कौम के अच्छे की खातिर काम हो अब,
छोड़ दो काफ़ी सियासत हो गयी है।

हर खुशी पर, मेरी बोलो तो भला क्यों,
तुमको बस रोने की  आदत हो गयी है?

मौलिक अप्रकाशित

Views: 902

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 15, 2020 at 7:29am

आदरणीय विनय निकोरे सर सादर आभार।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 15, 2020 at 7:28am

आदरणय रवि भसीन जी, सादर आभारं

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 15, 2020 at 7:28am

आदरणीय सौरभ सर, सादर हार्दिक आभारं

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 15, 2020 at 7:27am

आदरणीय भाई सुरेन्द्रनाथ जी, सादर हार्दिक आभार

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 15, 2020 at 7:26am

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, सादरaabhaar

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 15, 2020 at 7:26am

eआदरणीय  आशीष यादव जी, हार्दिक आभारं

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 15, 2020 at 7:25am

आदरणीय प्रदीप देवीशरण जी, उत्साहवर्धन के लिए सादर आभार

Comment by vijay nikore on January 7, 2020 at 3:08pm

गज़ल अच्छी बनी है। बधाई, मित्र सतविन्द्र जी।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 7, 2020 at 7:07am

हर तरह से हो चुकी समझाइशें पर 

नकचढ़ों को चिढ़ की आदत हो गयी है. 

हार्दिक बधाइयाँ, भाई सतविंदर जी.. 

शुभ-शुभ

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on January 6, 2020 at 7:42pm

आदरणीय सतविन्द्र कुमार राणा जी, बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। ख़ास तौर से आपका ये शे'अर बहुत अच्छा लगा:
कौम के अच्छे की खातिर काम हो अब
छोड़ दो काफ़ी सियासत हो गयी है

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