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ग़ज़ल - हम रह सकें ऐसा जहाँ तलाश रहा हूँ ( गिरिराज भंडारी )

22   22   22   22   22   2 

तू पर उगा, मैं आसमाँ तलाश रहा हूँ

हम रह सकें ऐसा जहाँ तलाश रहा हूँ

 

ज़र्रों में माहताब का हो अक्स नुमाया

पगडंडियों में कहकशाँ तलाश रहा हूँ

 

खामोशियाँ देतीं है घुटन सच ही कहा है    

मैं इसलिये तो हमज़बाँ तलाश रहा हूँ

 

जलती हुई बस्ती की गुनहगार हवा अब    

थम जाये वहीं,.. वो बयाँ तलाश रहा हूँ

 

मैं खो चुका हूँ शह’र तेरी भीड़ में ऐसे

हालात ये, कि ज़िस्म ओ जाँ तलाश रहा हूँ

 

दरिया ए गिला हूँ, कि न बह जाये बज़्म ये

मै आज बह्र-ए- बेकराँ तलाश रहा हूँ

 

मैं थक चुका हूँ ढूँढ, वो बहिश्त सा जहाँ

तारीख़ में लिक्खा जहाँ, तलाश रहा हूँ

****************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 8, 2017 at 12:41pm

आदरणीय आरिफ भाई , हौसला अफज़ाई का शुक्रिया आपका।

Comment by SALIM RAZA REWA on November 8, 2017 at 10:24am
आ. ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई
Comment by Ajay Tiwari on November 8, 2017 at 10:21am

आदरणीय गिरिराज जी,

इस ग़ज़ल की रदीफ़ में ही फइलुन (112) का इस्तेमाल है इसलिए ये यह 'बहरे-मीर' की ग़ज़ल नहीं हो सकती और इसमें 2121 या 1212 जैसी संरचना इस्तेमाल नहीं हो सकती क्योंकि 'मुतदारिक मक्बूज़ मुसक्किन' में इसकी अनुमति नहीं हैं. 

सादर 

Comment by Kalipad Prasad Mandal on November 7, 2017 at 2:37pm

आदरणीय  गिरिराज भाई बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई हैबधाई आपको 

Comment by Mohammed Arif on November 7, 2017 at 10:57am
आदरणीय गिरिराज भंडारी जी आदाब,बेहतरीन अश'आर से सुसज्जित ग़ज़ल । हर शे'र बढ़िया । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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