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कविता---बेबस क़लम और हम

क़लम लाचार है
विरोध की तेज़ धार है
घोषणाएँ जारी हैं
ग़रीब का भूखा पेट भी आभारी है
झोंपड़ियों के ऐब सारे ढँक गए
ग़रीब के घर बेबसी की बीमारी है
संसद में भूख का आँकड़ा गरमा रहा है
रहनुमा विकास का तराना गुनगुना रहा है
धर्म के ठेकेदारों की दबंगई है
ईमान की बोली सस्ती लगी है
दहशत में सबकुछ फलफूल रहा है
मदारी ख़ुद झूठ के बाँस पर चल रहा है
बहुत तरक़्की हो चुकी है
चैन की बाँसुरी भी सुर खो चुकी है
सरकार का चरित्र साफ़-साफ़ नज़र आ रहा है
विज्ञापन अख़बार को निगलता जा रहा है
झूठा नारा लगाना सबकी आदत बन गई है
दुर्घटना में मरना भी शहादत हो गई है
घर से निकलते हैं दबंगों के हाथों मरने के लिए
मज़बूरी में अवैध काम करने के लिए

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment

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Comment by Mohammed Arif on June 26, 2018 at 6:15pm

हार्दिक आभार आदरणीया नीलम उपाध्याय जी ।

Comment by Mohammed Arif on June 26, 2018 at 6:14pm

हार्दिक आभार आदरणीय श्याम नारायण जी ।

Comment by Mohammed Arif on June 26, 2018 at 6:13pm

रचना पर अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया देने का बहुत-बहुत शुक्रिया आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब ।

Comment by Chetan Prakash on June 26, 2018 at 5:25pm

The poem," Kavita- Bebas Kalam Aur Hum' is sorry to say, more like a commentary of a contemporary scene, though assumed not necessarily  grounded in reality.

Comment by Neelam Upadhyaya on June 26, 2018 at 2:14pm

आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी, नमस्कार । वर्तमान  परिवेश को बयां करती अच्छी कविता।  बधाई।   

Comment by Shyam Narain Verma on June 26, 2018 at 1:12pm
सुंदर रचना के लिए बहुत बधाई सादर
Comment by Samar kabeer on June 26, 2018 at 12:30pm

जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,बहुत गम्भीर और प्रभावशाली कविता हुई है, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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