For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

कविता---बेबस क़लम और हम

क़लम लाचार है
विरोध की तेज़ धार है
घोषणाएँ जारी हैं
ग़रीब का भूखा पेट भी आभारी है
झोंपड़ियों के ऐब सारे ढँक गए
ग़रीब के घर बेबसी की बीमारी है
संसद में भूख का आँकड़ा गरमा रहा है
रहनुमा विकास का तराना गुनगुना रहा है
धर्म के ठेकेदारों की दबंगई है
ईमान की बोली सस्ती लगी है
दहशत में सबकुछ फलफूल रहा है
मदारी ख़ुद झूठ के बाँस पर चल रहा है
बहुत तरक़्की हो चुकी है
चैन की बाँसुरी भी सुर खो चुकी है
सरकार का चरित्र साफ़-साफ़ नज़र आ रहा है
विज्ञापन अख़बार को निगलता जा रहा है
झूठा नारा लगाना सबकी आदत बन गई है
दुर्घटना में मरना भी शहादत हो गई है
घर से निकलते हैं दबंगों के हाथों मरने के लिए
मज़बूरी में अवैध काम करने के लिए

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Views: 379

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Mohammed Arif on June 26, 2018 at 6:15pm

हार्दिक आभार आदरणीया नीलम उपाध्याय जी ।

Comment by Mohammed Arif on June 26, 2018 at 6:14pm

हार्दिक आभार आदरणीय श्याम नारायण जी ।

Comment by Mohammed Arif on June 26, 2018 at 6:13pm

रचना पर अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया देने का बहुत-बहुत शुक्रिया आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब ।

Comment by Chetan Prakash on June 26, 2018 at 5:25pm

The poem," Kavita- Bebas Kalam Aur Hum' is sorry to say, more like a commentary of a contemporary scene, though assumed not necessarily  grounded in reality.

Comment by Neelam Upadhyaya on June 26, 2018 at 2:14pm

आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी, नमस्कार । वर्तमान  परिवेश को बयां करती अच्छी कविता।  बधाई।   

Comment by Shyam Narain Verma on June 26, 2018 at 1:12pm
सुंदर रचना के लिए बहुत बधाई सादर
Comment by Samar kabeer on June 26, 2018 at 12:30pm

जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,बहुत गम्भीर और प्रभावशाली कविता हुई है, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post उस बेवफ़ा से (ग़ज़ल)
"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। उम्दा गजल हुई है । हार्दिक बधाई । मंच पर काफी दिनों बाद दिखाई दिये ।…"
8 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' and Om Prakash Agrawal are now friends
9 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं....)
"आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । उम्दा गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
11 hours ago
सालिक गणवीर posted a blog post

ग़ज़ल ( नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं....)

(1222 1222 122)नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं बशर हूँ ,था बहुत मंहगा कभी मैंअभी जिसने रखा है घर से…See More
11 hours ago
Rahul Verma is now a member of Open Books Online
11 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' posted a blog post

उस बेवफ़ा से (ग़ज़ल)

221 / 2121 / 1221 / 212उस बेवफ़ा से दिल का लगाना बहुत हुआमजबूर दिल से हो ये बहाना बहुत हुआ [1]छोड़ो…See More
11 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

मजदूर अब भी जा रहा पैदल चले यहाँ-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/२२२/१२१२कहते भरे हुए हैं अब भण्डार तो बहुतलेकिन गरीब भूख से लाचार तो बहुत।१।**फिरता है आज…See More
11 hours ago
Manan Kumar singh posted a blog post

सफेद कौवा(लघुकथा)

कौवा तब सफेद था।बगुलों के साथ आहार के लिए मरी हुई मछलियां, कीड़े वगैरह ढूंढ़ता फिरता। फिर बगुलों…See More
11 hours ago
सतविन्द्र कुमार राणा posted a blog post

नहीं अच्छा है यूँ मजबूर होना- ग़ज़ल

1222 1222 122 नहीं अच्छा है यूँ मजबूर होना दिखो नजदीक लेकिन दूर होना।कली का कुछ समय को ठीक है, पर…See More
11 hours ago
Rakshita Singh commented on विनय कुमार's blog post अब नहीं- लघुकथा
"आदरणीय विनय जी, नमस्कार बहुत ही सुंदर लघुकथा ... बहुत बहुत बधाई !"
12 hours ago
Rakshita Singh commented on Sushil Sarna's blog post रंग काला :
"आदरणीय सुशील जी नमस्कार,  बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ ...  वास्तव  में काले रंग की यह भी…"
12 hours ago
AMAN SINHA commented on AMAN SINHA's blog post बेगैरत
"श्री "मुसाफिर" जी एवं "कबीर " साहब, समीक्षा के लिए धन्यवाद । "
12 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service