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गीतिका, आधार छंद- वाचिक महालक्ष्मी
(212 212 212)

शब्द अब गीत रचने लगे,
राज़ दिल के बिखरने लगे। /1/

दोस्त दुश्मन सभी दूर हैं
अब स्वयं को समझने लगे। /2/

नौकरी रिश्वतों से मिली,
आज अक्षम चमकने लगे। /3/

ठोकरें दीं सभी ने हमें,
पैर रखकर कुचलने लगे। /4/

प्रेम, दोस्ती रही आज तक,
शक हमें दूर रखने लगे। /5/

युग्म जुड़ कर करेंगे भला,
गीतिका-भाव भरने लगे। /6/

(मौलिक व अप्रकाशित)
_शेख़ शहज़ाद उस्मानी
शिवपुरी म.प्र.

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Comment

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 8, 2015 at 12:56pm
आदरणीय Ram Awadh Vishwakarma जी, बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद अवलोकन करने व प्रोत्साहन देने के लिए। उस पंक्ति में मापनी अनुसार परिमार्जन कर दिया है, कृपया पुनः अवलोकनार्थ प्रेषित
Comment by Ram Awadh VIshwakarma on October 8, 2015 at 12:21pm
गजल उर्फ गीतिका में आपने अच्छे शेर निकाले बधाई।प्रेम दोस्ती रही आज तक बह्र को शायद ठीक करने की आवश्यकता है।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 8, 2015 at 9:43am
बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद आदरणीय Jaiprakash Mishra जी।
Comment by Jayprakash Mishra on October 8, 2015 at 9:26am
नौकरी रिश्वतों से मिली,आज अक्षम चमकने लगे। /3/
Behatareen Janaab Usmaani saahab
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 8, 2015 at 8:02am
आदरणीया कान्ता राय जी व आदरणीय सतविंदर कुमार जी प्रोत्साहन प्रदान करने के लिए बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 8, 2015 at 8:01am
** "पटकने" के स्थान पर "रखने" पढ़ा जाये,कृपया।******
आदरणीय Samar Kabeer साहब बहुत बहुत शुक्रिया ग़लती की तरफ़ इशारा करने व प्रोत्साहन देने के लिए।
Comment by Samar kabeer on October 7, 2015 at 11:01pm
जनाब शहज़ाद जी,आदाब,आपकी गीतिका पसंद आई,अच्छे भाव रखे हैं आपने,इसके लिये बधाई स्वीकार करें,आपका ये शैर :-

"प्रेम, दोस्ती रही आज तक,
शक हमें दूर पटकने लगे"

आपका ये शैर बह्र में नहीं है देख लीजियेगा ।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 7, 2015 at 9:51pm
सुंदर।हार्दिक बधाई आदरणीय शेख सहज़ाद जी
Comment by kanta roy on October 7, 2015 at 6:37pm

युग्म जुड़ कर करेंगे भला,
गीतिका-भाव भरने लगे।---- !!! क्या खूब कही आपने आदरणीय शहज़ाद जी। बधाई काबुल फरमाइयें।

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