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थोड़ा आगे आने दो ,
मौक़ा उनको पाने दो ।


देखो, भटके फिरते हैं ,
उनको भी समझाने दो ।


कब तक सहना पाबंदी ,
दौर नया दिखलाने दो ।


सबको राहत मिल जाये ,
मौसम ऐसा आने दो ।


फिक्र करो मत दुनिया की ,
छोड़ो यारो जाने दो ।

.
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by नाथ सोनांचली on March 7, 2017 at 3:08pm
जनबे मोहम्मद आरिफ जी सादर अभिवादन। ग़ज़ल का उम्दा प्रयास, बधाई सादर
Comment by Samar kabeer on March 7, 2017 at 2:44pm
जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,इसके लिये बधाई स्वीकार करें ।
'फ़िक्र करो न तुम दुनिया की'
ये मिसरा बेबह्र हो गया है,इसे इस तरह लिखें:-
"फ़िक्र करो मत दुनिया की"

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