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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ५3

ग़ज़ल-  १२२२ १२२२ १२२२ १२२२

 

किसी ने क्यों कतर डाले हैं परवाज़ों के पर मेरे

फ़रिश्ते भी हैं उक़बा में अज़ल से मुंतज़र मेरे

 

हुजूमे ग़ैर से कोई तवक़्क़ो क्या करूँगा मैं

मेरी क़ीमत न कुछ  समझें ज़माने में अगर मेरे

 

फ़क़ीरी में गुज़ारी है ये हस्ती भी तुम्हारी है  

तेरी ज़र्रा नवाज़ी है कभी आये जो घर मेरे

 

कहूँ क्या हाय शर्मों में छुपी उसकी मुहब्बत को

वो घबरा के जो देखे है इधर मेरे उधर मेरे

 

कहाँ तुझको मिलेगी फ़िर मेरी बाहों की ये गर्मी

वफ़ा ठुकरा के क्यों जाता है ऐ लख्ते जिगर मेरे

 

मुहब्बत में नहीं कुछ कम मिले मुझको दिहाड़ी भी

चुरा के ले गया कोई वफ़ा के सब हुनर मेरे

 

वफ़ा की लाश पे मख्फ़ी उन्हीं के नक़्श थे मंकूश

जो ख़ासुल ख़ास थे मेरे, रहे जो मोतबर मेरे

 

रसाई आलमे बाला में है कुछ ‘राज़’ की ऐसी

लगा रहता है चक्कर में ज़माँ शामो सहर मेरे

 

~राज़ नवादवी

उक़बा- परलोक; अज़ल- सृष्टि की उत्पत्ति; मुंतज़र- जिसकी प्रतीक्षा की जाए; तवक़्क़ो- उम्मीद; लख्ते जिगर; जिगर का टुकड़ा; मख्फ़ी- छिपा हुआ, पोशीदा; मंकूश- अंकित; मोतबर- विश्वस्त; रसाई- पहुँच; आलमे बाला- परलोक 

"मौलिक एवं अप्रकाशित" 

 

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Comment by राज़ नवादवी on October 4, 2017 at 7:11pm

जनाब निलेश साहब, आपकी सुखन नवाजी का दिल से ममनून हूँ, शुक्रिया. बताई गई ख़ामी को समझने और दूर करने की कोशिश करूंगा. सादर. 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 4, 2017 at 11:15am

वाह आ. राज़ साहब, उम्दा ग़ज़ल है 
.

फ़क़ीरी में गुज़ारी है ये हस्ती भी तुम्हारी है  

तेरी ज़र्रा नवाज़ी है कभी आये जो घर मेरे..यहाँ शातुर्गुरबा की सूरत बन रही है शायद.
सादर 

Comment by राज़ नवादवी on October 3, 2017 at 5:43pm

आदरणीय सलीम रज़ा  साहब, आप का ह्रदय से आभार. सादर 

Comment by राज़ नवादवी on October 3, 2017 at 5:42pm

आदरणीय समर कबीर साहब, आप का ह्रदय से आभार. सादर 

Comment by SALIM RAZA REWA on October 3, 2017 at 5:05pm
जनाब राज़ साहिब,
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद,
Comment by Samar kabeer on October 3, 2017 at 2:46pm
जनाब राज़ नवादवी साहिब आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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