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माटी :कुछ दोहे

माटी :कुछ दोहे

माटी मिल माटी हुआ, माटी का इंसान।
माटी अंतिम हो गई,मानव की पहचान।।

माटी अंतिम हो गई,मानव की पहचान।
माटी- माटी हो गया, साँसों का अभिमान।।

माटी -माटी हो गया, साँसों का अभिमान।
खंडित सारे हो गए, जीने के वरदान।।

खंडित सारे हो गए, जीने के वरदान।
पल भर में माटी हुआ माटी का परिधान।।

पल भर में माटी हुआ, माटी का परिधान।
माटी के पुतले यही, तेरी है पहचान।।

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by TEJ VEER SINGH on May 14, 2020 at 9:37am

हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना जी। बेहतरीन दोहे।

माटी -माटी हो गया, साँसों का अभिमान।
खंडित सारे हो गए, जीने के वरदान।।

Comment by Samar kabeer on May 13, 2020 at 3:28pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छे दोहे लिखे आपने,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 12, 2020 at 7:41am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन । माटी को लेकर उत्तम दोहे रचे हैं । हार्दिक बधाई ।

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