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ग़ज़ल- हर कोई अनजान सी परछाइयों में क़ैद है

जानकर औक़ात अपनी वो हदों में क़ैद है
हर परिंदा आज अपने घोंंसलों में क़ैद है।।

जीत लेगा मौत को भी आदमी यूँ एक दिन
इस तरह की सोच सबकी हसरतों में क़ैद है।।

क्रोध लालच दम्भ नफ़रत ज़ात मजहब को लिए
हर कोई अनजान सी परछाइयों में क़ैद है।।

कब कहाँ किस को दग़ा दें रहनुमा इस देश के
झूठ मक्कारी तो उनकी आदतों में क़ैद है।।

जिस शजर की छाँव में बारात सजती थी कभी
आज वो वीरान बनके रतजगों में क़ैद है।।

टूट कर ख़ामोश जो दाने हुए तो जाना मैं
घुंघरूओं की खनखनाहट पायलों में क़ैद है।।

पूजना ही है अगर तो पूजिये माँ बाप को
बुतपरस्ती फालतू के दायरों में क़ैद है।।

वेदना और भूक की सौग़ात बचपन से लिये
मुफ़लिसी की ज़िन्दगी दुश्वारियों में क़ैद है।।

मानता हूँ मैं बहुत कुछ, मानता पर मैं नहीं
आसमाँ ये आदमी के हौसलों में क़ैद है।।

गेसुओं में आपका चहरा नज़र आता है यूँ
आसमाँ का चाँद जैसे बादलों में क़ैद है।।

 (मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Dimple Sharma on June 6, 2020 at 2:34pm

वाह आदरणीय बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई है , बधाई स्वीकार करें

Comment by Samar kabeer on June 6, 2020 at 12:10pm

जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by नाथ सोनांचली on June 6, 2020 at 4:37am

आद0 अमीरुद्दीन अमीर जी सादर अभिवादन। आपकी ग़ज़ल पर इस्लाह का बहुत बहुत शुक्रिया। आपके बताए जग्गो पर संसोधन कर लिया है।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on June 5, 2020 at 11:06pm

जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी, अचछी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। कुछ बिन्दुओं पर आपका ध्यानाकर्षण कराना चाहूँगा : हर परिंदा आज अपने घोसलों में क़ैद है। यहांँ घोसलों को घोंसलों कर लें।

क्रोध लालच दम्भ नफ़रत जात मजहब को लिए, यहांँ जात मजहब में ज के नीचे नुक़्ता लगा लें।

गैसुओं में आपका चहरा नज़र आता है यूँ, यहांँ गैसुओं को गेसुओं कर लें। 

और शेअ'र नं. 5:  जिस शजर की छाँव में बारात सजती थी कभी

                          आज वो वीरान बनके रतजगों में क़ैद है।।.         के दोनों मिसरों में भाव स्पष्ट नहीं है और रब्त भी नहीं है,

दूसरे मिसरे में विरोधाभास है। सादर। 

Comment by TEJ VEER SINGH on June 5, 2020 at 6:39pm

हार्दिक बधाई आदरणीय  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी।बेहतरीन गज़ल।

कब कहाँ किस को दग़ा दें रहनुमा इस देश के
झूठ मक्कारी तो उनकी आदतों में क़ैद है।।

पूजना ही है अगर तो पूजिये माँ बाप को
बुतपरस्ती फालतू के दायरों में क़ैद है।।

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