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है जो कुछ भी धरती का - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' ( गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२

अपना क्या है इस दुनिया में है जो कुछ भी धरती का
आग, हवा ये, फूल, समन्दर, चिड़िया, पानी धरती का।१।
**
क्या सुन्दरवन क्या आमेजन कोलोराडो क्या गौमुख
ये  हरियाली,  रेत  के  टीले,  सोना, चाँदी  धरती  का।२।
**
हिमशिखरों  की  चमक  चाँदनी  बारामूदा  का जादू
पीली नदिया,  हरा समन्दर  ताजा  बासी  धरती का।३।
**
बाँध न गठरी लूट धरा को अपना माल समझकर तू
ज्ञात समय को  तोला  मासा  रत्ती - रत्ती  धरती  का।४।
**
धरती ने  ही  हमें  धरा  पर  मिट्टी  से  उपजाया नित
चिन्तन कर लो नाम छोड़कर जो भी बाँकी धरती का।५।
**
चुप्पी साधो मत दोहन पर शिव का इससे कोप बढ़े
दण्ड उसे तो मिलना ही  है  जो अपराधी धरती का।६।
*
*
( रचना : जून १९९२ , पृथ्वी सम्मेलन के समय )
*
मौलिक-अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 12, 2020 at 6:46am

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन ।गजल पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया से खुशी हुई । इस स्नेह के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 12, 2020 at 6:43am

आ. मधु जी सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 12, 2020 at 6:42am

आ. भाई दण्डपाणि नाहक जी, सादर अभिवादन । गजल पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 12, 2020 at 6:40am

आ. भाई रवि भसीन जी, सादर अभिवादन । आपको गजल अच्छी लगी यह मेरे लिए हर्ष का विषय है । स्नेह व सराहना के लिए आभार ।

Comment by सालिक गणवीर on August 11, 2020 at 3:19pm

भाई लक्ष्मण धामी जी

सादर अभिवादन

सुंदर ग़ज़ल पाठकों तक पहुँचाने के लिए हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें.

Comment by Madhu Passi 'महक' on August 11, 2020 at 12:24pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी नमस्कार! बहुत ही सुंदर ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद।
Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on August 9, 2020 at 8:09pm

बहुत ख़ूब आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' भाई, इस सुंदर ग़ज़ल पर आपको ढेरों बधाई!

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