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सृष्टि का चलन

चाँद चमकता
सूर्य की ही रोशनी से
हर दिन,
एक दिन क्यों आ जाता
सूर्य और पृथ्वी के बीच,
लगाता सूर्य को ग्रहण
बहुत पास जाकर
रोकता उसका प्रकाश, 
बना देता है उसे
अपने ही जैसा,
यह प्यार है चाँद का
या जलन,
नहीं नहीं....
चन्द्र किरणों की तो
शीतल है छुअन
यह तो है बस
रचयिता की लीला
और सृष्टि का चलन !

मौलिक व अप्रकाशित

डॉ वन्दना मिश्रा


31/8/2020

Views: 461

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 11, 2020 at 7:48am

आ. वंदना जी, सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by आशीष यादव on September 10, 2020 at 10:04pm

एक अच्छी रचना हुई है। बधाई स्वीकार करें आदरणीया। 

Comment by Dimple Sharma on September 2, 2020 at 3:52pm

आदरणीया डॉ. वंदना मिश्रा जी नमस्ते, वाह बहुत खुबसूरत रचना हुई है आपकी बधाई स्वीकार करें आदरणीया।

Comment by Samar kabeer on August 31, 2020 at 8:08pm

मुहतरमा डॉ. वंदना मिश्रा जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

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