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अपना द्वार खुला अलबत्ता.- ग़ज़ल

मापनी २२ २२ २२ २२ 

है जिनके हाथों में सत्ता. 

उनका हर दिन बढ़ता भत्ता. 

छोड़ दिया जिसको डाली ने, 

इधर-उधर उड़ता वह पत्ता.

कीमत भारी होनी ही थी,

था पुस्तक पर मोटा गत्ता.

दुक्की-तिक्की जैसी जनता,

सत्ता तो आखिर है सत्ता.

कैसे अपनी लाज बचाये,

जिसके पास न कपड़ा लत्ता.  

ऊँचाई पर भी पहरे हैं,

जैसे मधुमक्खी का छत्ता.

बंद जियादातर हैं सबके,

अपना द्वार खुला अलबत्ता.

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 14, 2020 at 6:39pm

 आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसलाफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 12, 2020 at 6:32am

आ. भाई बसन्त कुमार जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 11, 2020 at 5:20pm

आदरणीय आशीष यादव  जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसलाफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 11, 2020 at 5:20pm

आदरणीय Samar kabeer जी सादर नमस्कार 

आपकी तरमीम हमेशा ही लाजबाब होती है 

आपकी हौसलाफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 11, 2020 at 5:19pm

आदरणीय Harash Mahajan  जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसलाफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 11, 2020 at 5:18pm

आदरणीय Sushil Sarna जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसलाफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 11, 2020 at 5:18pm

आदरणीय Dimple Sharma  जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसलाफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by आशीष यादव on September 10, 2020 at 10:50pm

आदरणीय श्री बसंत कुमार शर्मा साहब, एक अच्छी गजल बनी है। बधाई स्वीकार कीजिये। 

Comment by Samar kabeer on September 10, 2020 at 3:46pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

'जिनके भी हाथों में सत्ता'

उचित लगे तो इस मिसरे को यूँ कर लें:-

'है जिनके हाथों में सत्ता'

Comment by Harash Mahajan on September 8, 2020 at 11:46pm

सुंदर ग़ज़ल हुई है आ0 बसंत कुमार जी । बधाई ।

कृपया ध्यान दे...

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