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जाने क्यूँ आज है औरत की ये औरत दुश्मन

2122 1122 1122 22(112)

जाने क्यूँ आज है औरत की ये औरत दुश्मन,
पास दौलत है तो उसकी है ये दौलत दुश्मन ।

दोस्त इस दौर के दुश्मन से भी बदतर क्यूँ हैं,
देख होती है मुहब्बत की हकीकत दुश्मन ।

माँग लो जितनी ख़ुदा से भी ये ख़ुशियाँ लेकिन,
हँसते-हँसते भी हो जाती है ये जन्नत दुश्मन ।

मैं बदल सकता था हाथों की लकीरों को मगर,
यूँ न होती वो अगर मेरी मसर्रत दुश्मन ।

ऐसे इंसानों की बस्ती से रहो दूर जहॉं,
'हर्ष' हो जाए मुहब्बत की मुहब्बत दुश्मन ।

"स्वरचित व अप्रकाशित"

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Comment by Harash Mahajan on September 13, 2020 at 9:18am

आदरणीय भाई लक्षमण धामी जी आपकी स्नेहिल होंसिला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।

सादर ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 13, 2020 at 5:53am

आ. भाई हर्ष महाजन जी, सादर अभिवादन । सुन्दर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Harash Mahajan on September 11, 2020 at 10:13pm

आदरणीय जनाब अमीरुद्दीन जी मेरी पेशकरदा रचना पर आपकी आमद और तनक़ीद का बेहद शुक्रगुज़ार हूँ ।  आपके दिए गए सुझाव सच में बहुत ही बेहतरीन हैं जो कृति की शौभा बढ़ाती है । आपने कृति पर अपना कीमती समय दिया इसके लिए मैं तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।

सादर ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on September 11, 2020 at 6:36pm

आदरणीय हर्ष महाजन जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ। 

"यूँ न होती जो अगर मेरी मसर्रत दुश्मन"     जनाब इस मिसरे में अगर के साथ जो शब्द खटक रहा है, जो के बदले वो कर के देख सकते हैं। 

"ऐसे इंसानों की बस्ती से रहो दूर अगर,

इल्म हो जाए मुहब्बत की हकीकत दुश्मन"   अच्छा शे'र है लेकिन आप इस शे'र को ग़ज़ल का मक़्ता भी बना सकते हैं :

"ऐसे इंसानों की बस्ती से रहो दूर जहाँ,

'हर्ष' हो जाए मुहब्बत की मुहब्बत दुश्मन"  सादर। 

 

Comment by Harash Mahajan on September 11, 2020 at 12:30pm

आदरणीय आशीष यादव जी मुहब्बतों के लिए तहे दिल से शुक्रिया ।

सादर ।

Comment by Harash Mahajan on September 11, 2020 at 12:29pm

आदरणीय साध्वी सैनी जी रचना पर आपकी आमद और उस पर आपके स्नेहिल शब्दों के लिए बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by आशीष यादव on September 10, 2020 at 11:14pm

आदरणीय श्री हरष् महाजन जी अच्छी गजल पर मुबारकबाद कुबूल फरमायें। 

Comment by Harash Mahajan on September 10, 2020 at 8:15pm

आदरणीय सर समर कबीर जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति केके लिए कोटि कोटि धन्यवाद ।  सृजन के भावों को  इतना मान देने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया । 

सादर ।

Comment by Samar kabeer on September 10, 2020 at 4:02pm

जनाब हर्ष महाजन जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Harash Mahajan on September 9, 2020 at 7:17pm

आदरणीय डिंपल जी मेरी रचना पर आपकी आमद और उस पर आपकी प्रतिक्रिया का बहुत बहुत शुक्रिया ।

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