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पानी से आग बुझाने की ....

पानी से आग बुझाने की ....

किस तिनके ने दी इजाज़त
घर में धूप को आने की
दहलीज़ पे रातों की आकर
पलकों में ख़्वाब जलाने की
जिस खिड़की पर लगी थी चिलमन
नज़र से हुस्न बचाने की
उस खिड़की पर रुकी थी नज़रें
इस कम्बख़्त ज़माने की
मंज़िल उसको मान के हम
उसके इश्क में जलते रहे
वो चालें अपनी चलते रहे
हमसे हमें चुराने की
ख़्वाहिश बस ख़्वाहिश ही रही
पलकों में घर बनाने की
नादाँ दिल को मिली सज़ा
नज़रों से नज़र मिलाने की
कसर न छोड़ी उल्फ़त में
सावन ने आग लगाने की
और बढ़ी की जितनी कोशिश
पानी से आग बुझाने की 



सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on October 16, 2020 at 8:09pm

आदरणीय  अमीरुद्दीन 'अमीर' जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 14, 2020 at 8:33pm

आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, ख़ूबसूरत तख़्लीक़ हुई है तहे-दिल से मुबारकबाद पेश करता हूँ। सादर।

Comment by Sushil Sarna on October 14, 2020 at 6:50pm

आदरणीय Samar kabeer जी सृजन को मान देना का दिल से आभार। 

Comment by Samar kabeer on October 14, 2020 at 11:51am

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

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