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मुफलिसी में ही जिसका गुजारा हुआ - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२१२२//१२२१/२२१२


मुफलिसी में ही जिसका गुजारा हुआ
कौन शासन जो  उस का सहारा हुआ।१।

**
उसको जूठन का मतलब न समझाइए
जिस ने पहना हो  सब का उतारा हुआ।२।

**
चाद किस्मत में उस के नहीं था मगर
आस भर को भी  कोई  न तारा हुआ।३।

**
जिस ने जीवन जिया  है सहज कष्ट में
आप कहते  हैं  उस को  ही  हारा हुआ।४।

**
है  व्यवस्था  उसी  की  ये  कानून भी
न्याय मागे क्या शासन का मारा हुआ।५।

**
कौन ले थाह  उस की  सघन पीर की
वोट जिस को  दिया  वो नकारा हुआ।६।

*

मौलिक/अप्रकाशित

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' yesterday

आ. भाई बृजेश कुमार जी, सादर अभिवादन।गजल पर उपस्थिति व  उत्साह वर्धन के लिए धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' yesterday

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल पर पुनः उपस्थिति और मार्गदर्शन के लिए आभार।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Wednesday

अच्छी ग़ज़ल कही आदरणीय धामी जी

Comment by Samar kabeer on Tuesday

'ऐसा हलधर न शासन को प्यारा हुआ'

अब ठीक है ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Tuesday

आ भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और मार्गदर्शन के लिए आभार ।

मतले का शानी बदलने का प्रयास किया है । मार्गदर्शन करें। सादर

ऐसा हलधर न शासन को प्यारा हुआ।.

Comment by Samar kabeer on November 25, 2020 at 6:41pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

'मुफलिसी में ही जिसका गुजारा हुआ
कौन शासन जो  उस का सहारा हुआ'

मतले का सानी बदलने का प्रयास करें ।

कुछ टंकण त्रुटियाँ हैं,दुरुस्त कर लें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 22, 2020 at 7:39pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन ।गजल पर उपस्थिति व सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by TEJ VEER SINGH on November 21, 2020 at 7:08pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी।लाज़वाब गज़ल।

उसको जूठन का मतलब न समझाइए
जिस ने पहना हो  सब का उतारा हुआ।२

कौन ले थाह  उस की  सघन पीर की
वोट जिस को  दिया  वो नकारा हुआ।६।

*

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