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औरों से क्या आस रे जोगी-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२२/२२/२२/२२


मन में जब है प्यास रे जोगी
क्या लेना  सन्यास  रे जोगी।१।
*
महलों जैसे  सब  सुख भोगे
क्यों कहता बनवास रे जोगी।२।
*
व्यर्थ किया क्यों झूठे मद में
यौवन का मधुमास रे जोगी।३।
*
हम से कहता वासना त्यागो
छिप के करता रास रे जोगी।४।
*
खुद ही जब ये निभा न पाया
औरों से  क्या  आस रे जोगी।५।
*
मत कह बन्धन मुक्त हुआ है
तू भी हम  सा  दास रे जोगी।६।
*
तन का है या मन का बतला
मुख पर जो आभास रे जोगी।७।
*
हम जैसा  ही  तुझ  को होगा
अन्त समय अहसाह रे जोगी।८।
*
जब तक है यह मोह में डूबी
झूठी हर  अरदास  रे जोगी।९।
*
जीव जगत में क्या मिथ्या है
समझा दे  सायास  रे जोगी।१०।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 13, 2021 at 10:07am

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व उत्साहवर्धन के लिए आभार। आ. समर जी की बात का संज्ञान ले लिया है । सादर.....

Comment by सालिक गणवीर on January 12, 2021 at 7:04pm

आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी
आदाब
बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने ,बधाई स्वीकार करें। कबीर साहिब की बातों का संज्ञान लें.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 5, 2021 at 5:45pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति , उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन के लिए आभार।

Comment by Samar kabeer on January 5, 2021 at 5:37pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

'हम जैसा  ही  तुम  को होगा'

इस मिसरे में 'तुम' की जगह "तुझ" शब्द उचित होगा ।

'समझा दो  सायास  रे जोगी'

इस मिसरे में 'दो' की जगह "दे'' शब्द उचित होगा ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 5, 2021 at 1:15pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by TEJ VEER SINGH on January 5, 2021 at 11:48am

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी। बेहतरीन गज़ल।

हम से कहता वासना त्यागो
छिप के करता रास रे जोगी।४।

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