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हृदय की अनन्त गहराईयों में
प्रतिबिंबित करती है
प्रेम में बुद्ध हो जाने वाले
उस आदि पुरुष को
जो उसे पूर्णता प्रदान करे
नर
अपने हृदय लोक में
रेखांकित करता है
दृष्टि क्षितिज को आलोकित करती
सृष्टि की दिव्य उस कृति को
जो नर को
नर होने की पूर्णता प्रदान कर सके
नर-नारी पर्याय हैं
एक दूसरे के
उनका
आत्मीय समर्पण परिणाम है
नव दिव्य सूक्ष्म का
नर-नारी के गर्भ में
जीती है सृष्टि
सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on February 19, 2021 at 7:10pm

"आदरणीय   vijay nikoreजी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।"

Comment by Sushil Sarna on February 19, 2021 at 7:09pm

"आदरणीय   लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।"

Comment by vijay nikore on February 16, 2021 at 6:41am

बहुत ही सुन्दर रचना। हार्दिक बधाई।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 15, 2021 at 2:16pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन । सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Sushil Sarna on February 15, 2021 at 12:39pm

आदरणीय  Aazi Tamaamजी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on February 15, 2021 at 12:39pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब , सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है।

Comment by Samar kabeer on February 15, 2021 at 12:28pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Aazi Tamaam on February 15, 2021 at 2:54am

Beautiful सरना जी अच्छी रचना है बधाई स्वीकार करें

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