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मन पर दोहे ...........

मन पर दोहे ...........

मन माने तो भोर है, मन माने तो शाम ।
मन के सारे खेल हैं, मन के सब संग्राम । 1।
हर मन को मिलता नहीं, मन वांछित परिणाम ।
मन फल की चिन्ता करे, मन अशांति का धाम ।2।
मन मन्दिर में राम है, मन मन्दिर में श्याम ।
मन में गीता है बसी ,मन में मन का धाम ।3।
मन भावों का दास है, मन में भोग-विलास ।
कैसे मन का हो भला , मन में अतृप्त प्यास ।4।
मन चंचल है जीव का, ये दौड़े हर ओर ।
मन में तृप्ति कहीं नहीं , मन में गूँजे शोर ।5 ।

सुशील सरना

मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Sushil Sarna on April 20, 2021 at 7:30pm
सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी ।बहुत सुंदर सुझाव । हार्दिक आभार सर । संशोधन बनता है सर ।
Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 20, 2021 at 10:22am

आदरणीय सादर नमस्कार, उत्तम दोहे हुए हैं आपके, बधाई 

एक दोहे में लय भंग हो रही है, यदि उचित लगे तो यों कर सकते हैं 

केसे मन का हो भला , बुझे न मन की प्यास ।4।

Comment by Sushil Sarna on April 13, 2021 at 8:05pm
आदरणीय अमीरुद्दीन साहिब, आदाब - - - सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है ।
Comment by Sushil Sarna on April 13, 2021 at 8:03pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार । आप सही ✅ हैं सर । मैं अभी संशोधित कर पुनः प्रेषित करता हूँ ।हार्दिक आभार सर ।
Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on April 13, 2021 at 6:49pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, मन पर अच्छे दोहे हुए हैं, बधाई स्वीकार करें। 

हालांकि मैं इस विधा का जानकार नहीं हूँ, पर मुझे दूसरे दोहे में लय बाधित लग रही है, हो सकता है मैं ग़लत हूँ। सादर। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 13, 2021 at 6:34pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवाद । मन के दोहे अच्छे हुए हैं । हार्दिक बधाई ।

पाँचवे दोहे की तुकांतता मेरे हिसाब से ठीक नहीं है । देखिएगा। सादर..

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