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कैसी फ़ितरत के लोग होते हैं ?

दूसरे की आँखों में धूल झोंकने हेतु

नम्बर वही मोबाइल पर

नाम कुछ और जोड़ लेते हैं

दुर्जनों के दुर्वचन

सहिष्णुता की परख होते हैं

अपनी नहीं खुद उनकी

औक़ात बता देते हैं

उनकी माँ नहीं थीं, मेरे पिता

वे मुझमें माँ ढूँढते रहे,मैं उनमें पिता

उन्हे ना माँ मिलीं, ना मुझे पिता

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Usha Awasthi on April 20, 2021 at 8:03pm

आ0 सुशील सरन जी , हार्दिक आभार आपका

Comment by Sushil Sarna on April 20, 2021 at 7:27pm
वाह भावपूर्ण प्रस्तुति आदरणीया ऊषा जी । हार्दिक बधाई
Comment by Usha Awasthi on April 17, 2021 at 7:56pm

हार्दिक धन्यवाद आपको, लक्ष्मण धामी जी, सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 17, 2021 at 7:14pm

आ. ऊषा जी, अच्छी प्रस्तुति हुई है । हार्दिक बधाई।

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