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ग़ज़ल नूर की - दिल लगाएँ, दिल जलाएँ, दिल को रुसवा हम करें

दिल लगाएँ, दिल जलाएँ, दिल को रुसवा हम करें
चार दिन की ज़िन्दगी में और क्या क्या हम करें?
.
एक दिन बौनों की बस्ती से गुज़रना क्या हुआ
चाहने वो यह लगे क़द अपना छोटा हम करें.
.
हाथ बेचे ज़ह’न बेचा और फिर ईमाँ बिका  
पेट की ख़ातिर भला अब और कितना हम करें?
.
चाहते हैं हम को पाना और झिझकते भी हैं वो  
मसअला यानी है उनका ख़ुद को सस्ता हम करें.
.
इक सितम से रू-ब-रु हैं पर ज़ुबां ख़ुलती नहीं
ये ज़माना चाहता है उस का चर्चा हम करें.
.
बा-अदब हैं हम सो जाहिल से फ़क़त इतना कहा
आप अपने से न जाएँ तो रवाना हम करें.
.
निलेश "नूर"
मौलिक अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 15, 2021 at 9:49am

धन्यवाद आ. लक्ष्मण जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 11, 2021 at 7:01pm

आ. भाई नीलेश जी सादर अभिवादन ।सुन्दर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 11, 2021 at 12:22pm

शुक्रिया आ. सालिक जी 

Comment by सालिक गणवीर on June 11, 2021 at 11:40am

आदरणीय भाई Nilesh Shevgaonkarजी

आदाब

बेहद खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने,बधाई स्वीकार करें । 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 10, 2021 at 11:29am

शुक्रिया आ. समर सर 

Comment by Samar kabeer on June 9, 2021 at 2:45pm

जनाब निलेश जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 9, 2021 at 10:24am

शुक्रिया आ. आज़ी साहेब 

Comment by Aazi Tamaam on June 8, 2021 at 12:31pm

सादर प्रणाम आ नीलेश जी

बेहद खूबसूरत ग़ज़ल हुई है

सादर

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