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ग़ज़ल: ज़ुमुररुद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है

1222 1222 1222 1222

ज़ुमुररुद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है

मिरी जाँ ये तो बस शाहों कि पोशाकें सजाता है

रिआया भी तो देखो कितनी दीवानी सी लगती है

उसी को ताज़ कहती है जो इनके घर जलाता है

नगर में नफ़रतों के भी महब्बत कौन समझेगा

ए पागल दिल तू वीराने में क्यों बाजा बजाता है

हमारे हौसले तो कब के आज़ी टूट जाते पर

ये नन्हा सा परिंदा है जो आशाएँ जगाता है

कोई बेचे यहाँ आँसू तो कोई ज़िस्म बेचे है

खुदाया पेट भी इंसान से क्या क्या कराता है

गज़ब का इश्क़ है आज़ी ख़ुदा का ख़ुद के बंदो से

कभी दिल तोड़ देता है कभी वादा निभाता है

तमाशा देख कर हमको फ़कत इतना समझ आया

जो कश्ती पार करता है वही कश्ती डुबाता है

न लेकर प्यास लब पर तुम समंदर पर कभी जाना

सुना है ज़ख़्म पर सबके नमक पैहम लगाता है

कहाँ कोई किसी के वास्ते जीता है दुनिया में

कहाँ कोई किसी के वास्ते अब जाँ लुटाता है

चरागों से कोई पूछे फ़कत मज़बूरी का आलम

हवा का साथ भी लाज़िम है और डर भी सताता है

मौलिक व अप्रकाशित

आज़ी तमाम

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Comment

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Comment by Aazi Tamaam on July 13, 2021 at 9:59pm

सादर प्रणाम आ ब्रजेश जी

सहृदय शुक्रिया हौसला अफ़ज़ाई का

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 4, 2021 at 11:42am

आपके प्रयास बड़े अच्छे लगते है भाई आज़ी...बाकी गुरुजनों की नजर है तो सब है।

Comment by Aazi Tamaam on July 1, 2021 at 11:35am

सादर प्रणाम आ धामी सर

हौसला अफ़ज़ाई के लिये सहृदय शुक्रिया

जी धामी सर गुणीजनों के मार्गदर्शन में ग़ज़ल मुकम्मल हुई है

गुणीजनों को दिल से धन्यवाद

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 1, 2021 at 5:54am

आ. भाई आज़ी तमाम जी, गजल का प्रयास अच्छा है । हार्दिक बधाई । शेष सुधीजन कह चुके हैं । सादर..

Comment by Aazi Tamaam on June 29, 2021 at 5:59pm

सादर प्रणाम आ अमीर जी

ग़ज़ल तक आने व मार्गदर्शन करने के लिये सहृदय शुक्रिया

जी बदलने का प्रयास करता हूँ मिसरे

सादर

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on June 28, 2021 at 6:22pm

जनाब आज़ी तमाम साहिब आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है बधाई स्वीकार करें।

ज़ुमुररुद को टाईटल में भी ठीक कर लें।

'तिलिस्मी रत्न बस शाहों कि पोशाकें सजाता है'   इस मिसरे में रत्न के साथ तिलिस्मी शब्द (जादुई) का गठजोड़ उचित नहीं है वैसे भी दोनों शब्द अलग अलग भाषाओं के हैं। यूँ कह सकते हैं - 'जवाहर ये तो बस शाहों  की (not कि* एक मात्रा की छूट ले सकते हैं) पोशाकें सजाता है' 

'उसी को ताज़ कहती है जो इनके घर जलाता है'   इस मिसरे का शिल्प ठीक नहीं है, इसे यूंँ कह सकते हैं - 

'उसी को ताज पहनाती जो इनके घर जलाता है'।    कुछ टंकण त्रुटियों की ओर आपका ध्यानाकर्षण चाहता हूँ, सादर। 

'या रब ये पेट भी इंसान से क्या क्या कराता है'      यहाँ एक मात्रा की छूट न लेकर यूँ कहने से मिसरे में गेयता बढ़ जाएगी - 

'ख़ुदा या पेट भी इंसान से क्या क्या कराता है' 

Comment by Aazi Tamaam on June 27, 2021 at 5:59pm

सादर प्रणाम गुरु जी

गलतियाँ सुझाने व हौसला अफजाई के लिये सहृदय शुक्रिया

ठीक करके फ़िर से पोस्ट करने की कोशिश करता हूँ

सादर गुरु जी

Comment by Samar kabeer on June 27, 2021 at 12:32pm

जनाब आज़ी तमाम जी आदाब, ग़ज़ल अभी समय चाहती है,बहरहाल इस प्रयास पर बधाई स्वीकार करें ।

'ज़मुर्रद कब किसी मुफ़्लिस के घर चूल्हा जलाता है'

इस मिसरे में सहीह शब्द है "ज़ुमुररुद"

'जम्हूरियत भी तो देखो कितनी दीवानी सी लगती है'

ये मिसरा बह्र में नहीं है,देखिये ।

'नगर में नफ़रतों के इश्क़ इबादत कौन समझेगा'

ये मिसरा बह्र में नहीं है,देखिये ।

'कहाँ कोई किसी को अब यहाँ पर याद रखता है

ज़रा सा क्या हो जाये सुर्ख रू की भूल जाता है'

इस शैर पर मतले का गुमान होता है,सानी का वाक्य विन्यास ठीक नहीं ।

कृपया ध्यान दे...

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